शनिवार, 14 अप्रैल 2018
शनिवार, 7 अप्रैल 2018
Maफी मांगना -केजरीवाल का राजनीति में एक नया प्रयोग
माफी मांगना -केजरीवाल का राजनीति में एक नया प्रयोग
अरविंद केजरीवाल का मानहानि मामले में, पहले अकाली दल के बिक्रम सिंह मजीठिया से , फिर कपिल सिब्बल, राजनाथ सिंह व अन्यों से और फिर अरुण जेतली से माफी मांगना एक बार तो राजनीतिक गलियारों के हलचल सी मचा गया। जनता के एक बड़े हिस्से और विशेषकर आम आदमी पार्टी के साथ सहानुभूति रखने वाले कुछ लोगों ने केजरीवाल की आलोचना भी की। पंजाब विधान सभा में उनकी पार्टी के 20 विधायको में 4-5 को छोड़कर बाकी ने इतना बुरा मनाया कि अलग पार्टी बनाने की सोचने लगे। दिल्ली मेें पंजाब के ‘आप’ विधायकों की बुलाई गई मीटिंग में 14 विधायक मीटिंग में शामिल नहीं हुए। अचानक लिए गये फैसले के प्रति रोष होना स्वाभाविक था।
राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी केजरीवाल का यह फैसला अप्रत्याशित था। अप्रत्याशित इसलिए क्योंकि माफी मांगना आमतौर पर राजनेताओं के शब्दकोश में नहीं होता। चाहे उन्होंने कितने भी गलत काम किए हों। राजनीति विश्लेषक भी इस मुद्दे पर बंटे नजर आये। एक वर्ग जो केजरीवाल के माफीनामे के फैसले को गलत समझता था, का यह मानना था कि यह केजरीवाल के राजनीतिक भविष्य को विराम लगा देगा। वे इस फैसले को नौसिखिये और अनुभवहीन राजनीतिज्ञ का फैसला मानते हैं।
जबकि दूसरे वर्ग का कहना है कि ऐसा मानना एक भूल होगी। केजरीवाल भारतीय राजननीतिक पटल पर राजनीति की एक नई विधा लेकर आये हैं। और वह भी एक नये प्रयोग के साथ। वह स्वच्छ और ईमानदारी की राजनीति देना चाहते है। परन्तु अपने छोटे से अनुभव के साथ वे इतना तो समझ ही गये हैं वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था, जिसमें पैसे का इतना बड़ा रोल है, को एक दम बदलना इतना आसान नहीं हैै। राजनीति में दांव पेच भी जरूरी हैं अन्यथा घर बैठना होगा। अतः माफी मांगना उनकी रणनीति का एक हिस्सा है जैसे कि उनकी बातों से पता चलता है। इसे राजनीति में एक नूतन प्रयेाग कहा जा सकता है। क्योंकि ऐसे उदाहरण राजनीति में भी बहुत कम देखने में आते हैं।
बेशक माफी मांगने जैसा फैसला लेकर उन्होंने एक बहुत बड़ा जोखिम उठाया हो । लेकिन केजरीवाल इतने अपरिपक्व भी नहीं है कि वे इस प्रकार के जोखिमों को समझते न हों।
दिल्ली में अपनी पहली बार सरकार बनने के 49 दिन के पश्चात ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था जिससे उनकी काफी आलोचना हुई थी। तब भी उन्होंने दिल्ली की जनता से माफी मांगी थी। माफी मांगने वाला उनका यह अस्त्र इतना फायदेमंद सिद्ध हुआ कि दोबारा चुनाव होने पर दिल्ली की जनता की ओर से उन्हें अभूतपूर्व स्मर्थन मिला और उन्हें 70 में से 67 सीटों पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त हुई।
निश्चय ही केजरीवाल अपने सामने एक बहुत बड़े उद्देश्य को लेकर चल रहे हैं। इसलिये उस दिशा में फूंक-फूंक कर कदम उठा रहे हैं। फिलहाल उनके सामने 2019 का आम चुनाव है और उसके एक साल बाद हरियाणा विधान सभा का चुनाव भी है जिसके लिए वे अभी से अभियान शुरू कर रहे हैं। अतः मानहानि जैसे छोटे-मोटे मामलों में उलझ कर वे अपनी ऊर्जा खर्च नहीं करना चाहते ।
वे भारतीय जनता पाटी के मनसूबों को अच्छी तरह से समझे चुके हैं जो उन्हें इस प्रकार के मामलों में उलझाये रख कर उन्हें राजनीति में अपने पांव फैलाने से रोकने का प्रयत्न कर रही हैं। क्योंकि आने वाले दिनों में भाजपा कांग्रेस से भी ज्यादा केजरीवाल से भय खा रही है। यहीं कारण है कि केजरीवाल इन सब से मुक्त होकर अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ना चाहते हैं।
युद्ध के मैदान में भी शत्रु को मात देने के लिये कभी-कभी पीछे हट कर शत्रु पर जोरदार हमला बोला जाता है। शायद यही रणनीति केजरवाल यहां अपनाने जा रहे हैं।
वैसे भी भारतीय दर्शनशास्त्र यह दर्शाता है कि अपनी गलती पर क्षमा मांगने से कोई छोटा नहीं हो जाता। ऐसे में माफी मांगने वाला उनका यह फैसला एक तरफ उनकी विनम्रता को और दूसरी ओर उनकी राजनीतिक परिपक्वता को ही दर्शाता है। जिससे जनता की ओर से उन्हें फायदा ही मिलेगा।
निश्चय ही राजनीति में उनका ये फैसला एक नया प्रयोग है।
अरविंद केजरीवाल का मानहानि मामले में, पहले अकाली दल के बिक्रम सिंह मजीठिया से , फिर कपिल सिब्बल, राजनाथ सिंह व अन्यों से और फिर अरुण जेतली से माफी मांगना एक बार तो राजनीतिक गलियारों के हलचल सी मचा गया। जनता के एक बड़े हिस्से और विशेषकर आम आदमी पार्टी के साथ सहानुभूति रखने वाले कुछ लोगों ने केजरीवाल की आलोचना भी की। पंजाब विधान सभा में उनकी पार्टी के 20 विधायको में 4-5 को छोड़कर बाकी ने इतना बुरा मनाया कि अलग पार्टी बनाने की सोचने लगे। दिल्ली मेें पंजाब के ‘आप’ विधायकों की बुलाई गई मीटिंग में 14 विधायक मीटिंग में शामिल नहीं हुए। अचानक लिए गये फैसले के प्रति रोष होना स्वाभाविक था।
राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी केजरीवाल का यह फैसला अप्रत्याशित था। अप्रत्याशित इसलिए क्योंकि माफी मांगना आमतौर पर राजनेताओं के शब्दकोश में नहीं होता। चाहे उन्होंने कितने भी गलत काम किए हों। राजनीति विश्लेषक भी इस मुद्दे पर बंटे नजर आये। एक वर्ग जो केजरीवाल के माफीनामे के फैसले को गलत समझता था, का यह मानना था कि यह केजरीवाल के राजनीतिक भविष्य को विराम लगा देगा। वे इस फैसले को नौसिखिये और अनुभवहीन राजनीतिज्ञ का फैसला मानते हैं।
जबकि दूसरे वर्ग का कहना है कि ऐसा मानना एक भूल होगी। केजरीवाल भारतीय राजननीतिक पटल पर राजनीति की एक नई विधा लेकर आये हैं। और वह भी एक नये प्रयोग के साथ। वह स्वच्छ और ईमानदारी की राजनीति देना चाहते है। परन्तु अपने छोटे से अनुभव के साथ वे इतना तो समझ ही गये हैं वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था, जिसमें पैसे का इतना बड़ा रोल है, को एक दम बदलना इतना आसान नहीं हैै। राजनीति में दांव पेच भी जरूरी हैं अन्यथा घर बैठना होगा। अतः माफी मांगना उनकी रणनीति का एक हिस्सा है जैसे कि उनकी बातों से पता चलता है। इसे राजनीति में एक नूतन प्रयेाग कहा जा सकता है। क्योंकि ऐसे उदाहरण राजनीति में भी बहुत कम देखने में आते हैं।
बेशक माफी मांगने जैसा फैसला लेकर उन्होंने एक बहुत बड़ा जोखिम उठाया हो । लेकिन केजरीवाल इतने अपरिपक्व भी नहीं है कि वे इस प्रकार के जोखिमों को समझते न हों।
दिल्ली में अपनी पहली बार सरकार बनने के 49 दिन के पश्चात ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था जिससे उनकी काफी आलोचना हुई थी। तब भी उन्होंने दिल्ली की जनता से माफी मांगी थी। माफी मांगने वाला उनका यह अस्त्र इतना फायदेमंद सिद्ध हुआ कि दोबारा चुनाव होने पर दिल्ली की जनता की ओर से उन्हें अभूतपूर्व स्मर्थन मिला और उन्हें 70 में से 67 सीटों पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त हुई।
निश्चय ही केजरीवाल अपने सामने एक बहुत बड़े उद्देश्य को लेकर चल रहे हैं। इसलिये उस दिशा में फूंक-फूंक कर कदम उठा रहे हैं। फिलहाल उनके सामने 2019 का आम चुनाव है और उसके एक साल बाद हरियाणा विधान सभा का चुनाव भी है जिसके लिए वे अभी से अभियान शुरू कर रहे हैं। अतः मानहानि जैसे छोटे-मोटे मामलों में उलझ कर वे अपनी ऊर्जा खर्च नहीं करना चाहते ।
वे भारतीय जनता पाटी के मनसूबों को अच्छी तरह से समझे चुके हैं जो उन्हें इस प्रकार के मामलों में उलझाये रख कर उन्हें राजनीति में अपने पांव फैलाने से रोकने का प्रयत्न कर रही हैं। क्योंकि आने वाले दिनों में भाजपा कांग्रेस से भी ज्यादा केजरीवाल से भय खा रही है। यहीं कारण है कि केजरीवाल इन सब से मुक्त होकर अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ना चाहते हैं।
युद्ध के मैदान में भी शत्रु को मात देने के लिये कभी-कभी पीछे हट कर शत्रु पर जोरदार हमला बोला जाता है। शायद यही रणनीति केजरवाल यहां अपनाने जा रहे हैं।
वैसे भी भारतीय दर्शनशास्त्र यह दर्शाता है कि अपनी गलती पर क्षमा मांगने से कोई छोटा नहीं हो जाता। ऐसे में माफी मांगने वाला उनका यह फैसला एक तरफ उनकी विनम्रता को और दूसरी ओर उनकी राजनीतिक परिपक्वता को ही दर्शाता है। जिससे जनता की ओर से उन्हें फायदा ही मिलेगा।
निश्चय ही राजनीति में उनका ये फैसला एक नया प्रयोग है।
फोटो:
बलदेव सिंह महरोक
सोमवार, 2 अप्रैल 2018
आजकल मां खबरें सुनाने के लिए नहीं कहतीं
(बलदेव सिंह महरोक)
मेरी बूढ़ी मां अनपढ़ है। वह पढना नहीं जानती। मुझे अखबार से खबरें सुनाने के लिए कहा करती है।
मैं अक्सर उन्हें खबरें पढ़कर सुनाया करता हूं।
आज मैंने बड़े गर्व के साथ एक खबर पढ़ कर सुनाई।
-मां, हमारे जवानों ने पाकिस्तान के चार जवान मार दिए।
-क्यों बेटा ? उसने पूछा।
-क्योंकि कल उनके जवानों ने हमारी दो जवान शहीद कर दिया था।
मैं दूसरी खबर पढ़कर सुनाने लगा तो मां बोली-बेटा, बस करो, अब और मत सुनाओ।
फिर कुछ रुक गंभीर हो कर बोली -बेटा, शहीद क्या होता है?
मां, दुश्मन ने हमारे दो जवानों को मारा था। जब दुश्मन हमारे जवानों को मारता है तो हम उन्हें शहीद कहते हैं।
मां, एक बार फिर चुप हो गईं और पता नहीं किन विचारों में खो गईं।
कुछ देर बाद फिर बोलीं-बेटा, हमारे जवानों ने उनके जवानों को क्यों मारा है।
-मां, वो हमारे दुश्मन हैं।
-और हम उनके कौन हैं।
-हम उनके दुश्मन हुए।
-पर, बेटा, उधर भी तो माओं के बेटे शहीद हुए होंगे।
मां की आवाज़ कहीं दूर से आती सुनाई दे रही थी।
-मां, वे हमारे दुश्मन हंै। हमने उन्हें मौत के घाट उतारा है।
मां गले में अटका थूक निगलते बोली-हमारे इधर की माओं के बेटों की उधर की माओं के बेटों के साथ क्या दुश्मनी थी ?
मां का प्रश्न मुझे विचलित करने वाला था।
-मां, जवानों जवानों की आपस में दुश्मनी थोड़े ही होती है। उधर भी सैनिक होते हैं, इधर भी सैनिक होते हैं। उनकी डियूटी तो लड़ने की होती है। सीमा पार के लोगों से लड़ना । उन्हें मारना।
-पर ये लड़ते क्यों हैं?
-मां, इन्हें सरकार द्वारा जो हुक्म मिलता है, वही करते हैं।
-वे क्यों ऐसा करते हैं?
-क्योकिं उन्हें इसी काम के लिए रखा जाता है जिसके बदले में उन्हें वेतन मिलता है।
-यानि वे पैसे लेकर उन लोगों को मारते हैं जिनके साथ उनकी कोई दुश्मनी नहीं होती।
मां की आंखें कहीं दूर शून्य में झांक रही थीं। मानो कुछ देख रही हों।
आजकल मां मुझे खबरें सुनाने के लिए नहीं कहती।
(कृपया अपनी प्रतिक्रिया देवें। आभारी होऊंगा)
(बलदेव सिंह महरोक)
मेरी बूढ़ी मां अनपढ़ है। वह पढना नहीं जानती। मुझे अखबार से खबरें सुनाने के लिए कहा करती है।
मैं अक्सर उन्हें खबरें पढ़कर सुनाया करता हूं।
आज मैंने बड़े गर्व के साथ एक खबर पढ़ कर सुनाई।
-मां, हमारे जवानों ने पाकिस्तान के चार जवान मार दिए।
-क्यों बेटा ? उसने पूछा।
-क्योंकि कल उनके जवानों ने हमारी दो जवान शहीद कर दिया था।
मैं दूसरी खबर पढ़कर सुनाने लगा तो मां बोली-बेटा, बस करो, अब और मत सुनाओ।
फिर कुछ रुक गंभीर हो कर बोली -बेटा, शहीद क्या होता है?
मां, दुश्मन ने हमारे दो जवानों को मारा था। जब दुश्मन हमारे जवानों को मारता है तो हम उन्हें शहीद कहते हैं।
मां, एक बार फिर चुप हो गईं और पता नहीं किन विचारों में खो गईं।
कुछ देर बाद फिर बोलीं-बेटा, हमारे जवानों ने उनके जवानों को क्यों मारा है।
-मां, वो हमारे दुश्मन हैं।
-और हम उनके कौन हैं।
-हम उनके दुश्मन हुए।
-पर, बेटा, उधर भी तो माओं के बेटे शहीद हुए होंगे।
मां की आवाज़ कहीं दूर से आती सुनाई दे रही थी।
-मां, वे हमारे दुश्मन हंै। हमने उन्हें मौत के घाट उतारा है।
मां गले में अटका थूक निगलते बोली-हमारे इधर की माओं के बेटों की उधर की माओं के बेटों के साथ क्या दुश्मनी थी ?
मां का प्रश्न मुझे विचलित करने वाला था।
-मां, जवानों जवानों की आपस में दुश्मनी थोड़े ही होती है। उधर भी सैनिक होते हैं, इधर भी सैनिक होते हैं। उनकी डियूटी तो लड़ने की होती है। सीमा पार के लोगों से लड़ना । उन्हें मारना।
-पर ये लड़ते क्यों हैं?
-मां, इन्हें सरकार द्वारा जो हुक्म मिलता है, वही करते हैं।
-वे क्यों ऐसा करते हैं?
-क्योकिं उन्हें इसी काम के लिए रखा जाता है जिसके बदले में उन्हें वेतन मिलता है।
-यानि वे पैसे लेकर उन लोगों को मारते हैं जिनके साथ उनकी कोई दुश्मनी नहीं होती।
मां की आंखें कहीं दूर शून्य में झांक रही थीं। मानो कुछ देख रही हों।
आजकल मां मुझे खबरें सुनाने के लिए नहीं कहती।
(कृपया अपनी प्रतिक्रिया देवें। आभारी होऊंगा)
मंगलवार, 27 मार्च 2018
सीता पूछे एक स्वाल
सीता पूछे एक स्वाल
‘तुमने मुझसे साढ़े तीन हजार साल पहले विवाह किया था?’
‘‘हां, किया था’
‘और मैंने 14 वर्षोें तक अपने सारे सुख त्याग कर तुम्हारा जंगलों में साथ निभाया था। "
‘हां, निभाया था’
‘इसके बावाजूद फिर तुमने मुझ पर अविश्वास क्यों किया? मेरा त्याग क्यों किया?’"
‘‘पर लोगों की ज़बान तो नहीं पकड़ी जा सकती थी ना! "
‘‘ठीक है। अगर यह बात है तो आज मैं स्वयं ही तुम्हारा त्याग करती हूॅं।"
‘पर क्यों?’
वह सीता कई हजार साल पहले राम के पल्लू में दी गई थी अब पढ़ लिख कर अपना भला बुरा स्वयं सोचने लगी है। आज उसे भी राम से एक स्वाल पूछने का साहस है।’
‘ क्या ? ठीक है, चलो, पूछो!’
‘यही कि मैं तुम पर यह कैसे विश्वास कर लूं कि मेरी अनुपस्थिति में तुमने भी किसी.....’
‘अ..अ..अ............!!!’
*******
कृपया इस पोस्ट को like करें और अपने comments देवें। आपकी प्रतिक्रिया जानकर ख़ुशी होगी))
‘तुमने मुझसे साढ़े तीन हजार साल पहले विवाह किया था?’
‘‘हां, किया था’
‘और मैंने 14 वर्षोें तक अपने सारे सुख त्याग कर तुम्हारा जंगलों में साथ निभाया था। "
‘हां, निभाया था’
‘इसके बावाजूद फिर तुमने मुझ पर अविश्वास क्यों किया? मेरा त्याग क्यों किया?’"
‘‘पर लोगों की ज़बान तो नहीं पकड़ी जा सकती थी ना! "
‘‘ठीक है। अगर यह बात है तो आज मैं स्वयं ही तुम्हारा त्याग करती हूॅं।"
‘पर क्यों?’
वह सीता कई हजार साल पहले राम के पल्लू में दी गई थी अब पढ़ लिख कर अपना भला बुरा स्वयं सोचने लगी है। आज उसे भी राम से एक स्वाल पूछने का साहस है।’
‘ क्या ? ठीक है, चलो, पूछो!’
‘यही कि मैं तुम पर यह कैसे विश्वास कर लूं कि मेरी अनुपस्थिति में तुमने भी किसी.....’
‘अ..अ..अ............!!!’
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रविवार, 25 मार्च 2018
nanhi chidiya नन्ही चिड़िया

-बलदेव सिंह महरोक
एक था चिड़िया का नन्हा बच्चा . उसके छोटे छोटे पंख उग आये थे.
वह धीरे धीरे अपने घोंसले के आसपास फुदकने लगा था । वहां से यहाँ., यहाँ से वहां।
कुछ दिन बाद उसके पंख कुछ बड़े हो गये. अब वह उड़ना चाहता था। आसमान में.. मुक्त हवा में।
परन्तु उसकी माँ चिड़िया बार बार उसे खींच लाती वापिस घोंसले में। 'तू अभी इतना बड़ा नहीं हु आ । बैठ यहां। बाहर बहेलिये जाल लगाए बैठे हैं ' , नन्हा बच्चा मन मसोस कर रह गया ।
घोंसले में बैठा बैठा वह आसमान में उड़ते हुए पक्षिओं को देखता
'पता नहीं मैं कब उड़ूँगा . ' वह सोचता ।
फिर एक दिन नन्हा बड़ा गया। अब वह अच्छी तरह उड़ सकता था. हाँ. . एक दिन मां चिड़िया ने उसे उड़ते देखा तो बहुत खुश हुई. .
बोली, जाओ मेरे बच्चे , यह विशाल आसमान तुम्हारा इन्तजार कर रहा है. उड़ते रहो जब तक साँस 'है ।
और बच्चे ने अपनी माँ की ओर देखा। चिड़िया ने अपने बच्चे की ओर देखा.
'बॉय मम्मी,' बच्चा बोला और माँ देखती रही, उसे उड़ते हुए। दूर तक; . जब तक कि वह आँखों से ओझल नहीं हो गया। चिड़िया के चेहरे पर मुस्कान थी. .
और आंसुओं की एक बूँद माँ चिड़िया की आँखों से निकल कर उसकी चोंच पर लुडक गई. ;
आज उसे आज अपनी पूर्णता का एहसास हो रहा था.
;

-बलदेव सिंह महरोक
एक था चिड़िया का नन्हा बच्चा . उसके छोटे छोटे पंख उग आये थे.
वह धीरे धीरे अपने घोंसले के आसपास फुदकने लगा था । वहां से यहाँ., यहाँ से वहां।
कुछ दिन बाद उसके पंख कुछ बड़े हो गये. अब वह उड़ना चाहता था। आसमान में.. मुक्त हवा में।
परन्तु उसकी माँ चिड़िया बार बार उसे खींच लाती वापिस घोंसले में। 'तू अभी इतना बड़ा नहीं हु आ । बैठ यहां। बाहर बहेलिये जाल लगाए बैठे हैं ' , नन्हा बच्चा मन मसोस कर रह गया ।
घोंसले में बैठा बैठा वह आसमान में उड़ते हुए पक्षिओं को देखता
'पता नहीं मैं कब उड़ूँगा . ' वह सोचता ।
फिर एक दिन नन्हा बड़ा गया। अब वह अच्छी तरह उड़ सकता था. हाँ. . एक दिन मां चिड़िया ने उसे उड़ते देखा तो बहुत खुश हुई. .
बोली, जाओ मेरे बच्चे , यह विशाल आसमान तुम्हारा इन्तजार कर रहा है. उड़ते रहो जब तक साँस 'है ।
और बच्चे ने अपनी माँ की ओर देखा। चिड़िया ने अपने बच्चे की ओर देखा.
'बॉय मम्मी,' बच्चा बोला और माँ देखती रही, उसे उड़ते हुए। दूर तक; . जब तक कि वह आँखों से ओझल नहीं हो गया। चिड़िया के चेहरे पर मुस्कान थी. .
और आंसुओं की एक बूँद माँ चिड़िया की आँखों से निकल कर उसकी चोंच पर लुडक गई. ;
आज उसे आज अपनी पूर्णता का एहसास हो रहा था.
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शनिवार, 24 मार्च 2018
वह सांवली लड़की
वह सांवली लड़की
कन्धों पर एक फटी बोरी लटकाए
तीखे नैन नक्श वाली लड़की
भरी यौवना सी
निर्लिप्त नैन
फटे कुर्ते से झांकते
अपने फटे अंचल से
रह रह कर छुपाती अपने यौवन को
वह सांवली लड़की
सड़कों के किनारे \
दुकानों के सामने/मकानों के पीछे
कूड़े के ढेर पर बीनती
कागज के टुकड़े
प्लास्टिक थैलियां
लोहे के टुकड़े
वे अलहड़ सी
इसी ---धरती की पुत्री
किसी चित्रकार की मूर्ति
कभी झुकती, कभी उठती
आसपास से बेखबर
सहसा उसकी की बगल में
कार से उतरी एक
चिट्टे दूध रंग की युवती
बाल कटे हुए
भवें तराशे हुई
ब्यूटी पार्लर से सजी
कृत्रिम मेकअप से
व्यर्थ में छुपाते हुए गालों
पर उभर आये धब्बों को
ऊँची एड़ी के सैंडिल को ठपठपाती,
कार के पास से गुजरते
कागज बीनते लड़की को
हिकारत से देखकर
नाक पर रुमाल रखा
शो रूम में दाखिल होते ही
उसने साँवले सुन्दर चेहरे को देखा
और तुलना की अपने चेहरे से
कहीं ज्यादा खूसूरत थी वह सांवली लड़की
और देखती रह गई।
अपने से कहीं ज्यादा अमीर लगी उसे
वह सांवली लड़की
जल गयी देखकर ईर्ष्या से
उसे अपना चेहरा और भी कुरूप लगने लगा
और वह सांवली लड़की
अपने आसपास से अनभिज्ञ
लपकी एक बड़ा सा प्लास्टिक का टुकड़ा देखकर
मिल गया हो मानो
उसे कोई खजाना
चमक उठी आँखें उसकी।
अब उसका सांवला चेहरा
और भी दमकने लगा।
वह सांवली लड़की
कन्धों पर एक फटी बोरी लटकाए
तीखे नैन नक्श वाली लड़की
भरी यौवना सी
निर्लिप्त नैन
फटे कुर्ते से झांकते
अपने फटे अंचल से
रह रह कर छुपाती अपने यौवन को
वह सांवली लड़की
सड़कों के किनारे \
दुकानों के सामने/मकानों के पीछे
कूड़े के ढेर पर बीनती
कागज के टुकड़े
प्लास्टिक थैलियां
लोहे के टुकड़े
वे अलहड़ सी
इसी ---धरती की पुत्री
किसी चित्रकार की मूर्ति
कभी झुकती, कभी उठती
आसपास से बेखबर
सहसा उसकी की बगल में
कार से उतरी एक
चिट्टे दूध रंग की युवती
बाल कटे हुए
भवें तराशे हुई
ब्यूटी पार्लर से सजी
कृत्रिम मेकअप से
व्यर्थ में छुपाते हुए गालों
पर उभर आये धब्बों को
ऊँची एड़ी के सैंडिल को ठपठपाती,
कार के पास से गुजरते
कागज बीनते लड़की को
हिकारत से देखकर
नाक पर रुमाल रखा
शो रूम में दाखिल होते ही
उसने साँवले सुन्दर चेहरे को देखा
और तुलना की अपने चेहरे से
कहीं ज्यादा खूसूरत थी वह सांवली लड़की
और देखती रह गई।
अपने से कहीं ज्यादा अमीर लगी उसे
वह सांवली लड़की
जल गयी देखकर ईर्ष्या से
उसे अपना चेहरा और भी कुरूप लगने लगा
और वह सांवली लड़की
अपने आसपास से अनभिज्ञ
लपकी एक बड़ा सा प्लास्टिक का टुकड़ा देखकर
मिल गया हो मानो
उसे कोई खजाना
चमक उठी आँखें उसकी।
अब उसका सांवला चेहरा
और भी दमकने लगा।
बुधवार, 21 मार्च 2018
baathaipar
सरहद पार से आने वाली कुछ खुशबूदार हवाओं के झौंके

हमारी एक बनी बनाई धारणा है कि पाकिस्तान की ओर आने वाली हवायें हमेशा जहरीली और नफरत भरी होती हैं।
हम नहीं जानते कि इस प्रकार की हवायें पाकिस्तान के भीतर से चलती है या उनमें कहीं रास्ते में ज़हर घुल जाता है, मगर हम इतना
जरूर जानते हैं कि ये हवांये बहुधा अच्छी नहीं होतीं।
लेकिन पिछले दिनों सरहद के उस पार से हवाआंें के दो-तीन खुशबूदार झौंके आये। जिन लोगों को इनके बारे पता चला उन्होंने इसे जरूर महसूस किया है।
एक झौंका तब आया जब स्विटजर्लैंड के सैंट मौरिज में पाकिस्तान क्रिकेटर के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी अपने हिन्दुस्तानी फैंस के आग्रह पर उनके साथ फोटो खिंचवाने लगे। हुआ यूं कि एक हिंदुस्तानी लड़की के हाथ में तिरंगा झंडा पकड़ा हुआ था। वह उसे छुपाने का प्रयास करने लगी शायद यह सोच कर कि पाकिस्तानी क्रिकेटर को यह अच्छा न लगे।
मगर शाहिद अफरीदी ने उसकी इस बात को भांप लिया और उसने उस लड़की से तिरंगे को सामने फैलाने के लिये कहा। और तिरंगा सामने फैलाने के बाद बड़ी शान से उसने अपने हिंदुस्तानी चाहने वालों के साथ फोटो खिंचवाई। यही नहीं, अफरीदी ने कहा- ‘हमें एक दूसरे देशों के झण्डे का सम्मान करना चाहिये।
ऐसा करके शाहिद ने हिंदुस्तानियों का दिल जीत लिया। इस पूरी घटना की वीडियो मीडिया में वायरल हुआ । कुछ टीवी चैनलों ने भी इसे दिखाया। जिस ने भी मीडिया में देखा वह पाकिस्तान के इस खिलाड़ी की तारीफ किये बिना न रह सका।
वाह अफरीदी साहब ! आपने हमारे देश के झंडे का सम्मान किया । इसके उत्तर में हम आपके इस जज़्बे को सलाम करते हैं। आपने दोनों देशों के अवाम को एक बहुत बड़ा पैगाम दे दिया है।
दूसरी घटना राजस्थान के हिंदू परिवार की है जिन्होंने अपनी लड़की का रिश्ता पाकिस्तान में रह रहे एक हिन्दू परिवार के लड़के के साथ किया है। लड़के और उसके पिता को वीजा मिल गया परंतु मां का वीजा किसी कारण अटक गया था। हो सकता है बाद में हल हो गया हो।
हमारे एक-दो टीवी चैनलों ने इस खबर को संक्षिप्त रूप में दिखाया और यह भी बताया कि पाकिस्तान में रह रहे इस हिंदू लड़के का परिवार वहां बड़ी शानो-शौकत के साथ रह रहा है।
और तीसरा खुशबूदार हवा का झौंका तब आया जब पाकिस्तान में 38 वर्षीय कृष्णा कुमारी कोहली नाम की एक हिंदू लड़की को वहां की सीनेट का सदस्य चुना गया। वह पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) की ओर से उमीदवार थी। वहां की सीनेट को लगभग वे सभी शक्तियां प्राप्त हैं जो हमारे यहां लोकसभा को है। कृष्णा कुमारी पाकिस्तान में एक हिंदु दलित परिवार से संबंध रखती है जिनका परिवार स्वंतंत्रता सैनानी रहा है। उनके परिवार के एक व्यक्ति को 1858 में ब्रिटिश सरकार ने फांसी पर भी लटका दिया था।
इस प्रकार से यदा-कदा आने वाले समाचार हमारी कई धारणाओं को झुठला देते हैं।
हमारा मीडिया इस प्रकार की खबरें बहुत कम देता है और अगर देता भी है तो बहुत संक्षिप्त रूप में। ...अपनी-अपनी मजबूरियां होती हैं।
खैर, ऐसी हवाये ंहमेशा आती रहें। यही हमारी तमन्ना है। हमारी इच्छा है कि सरहद के दोनों ओर के आवाम खुश रहें।
और हां, चलते-चलते......
पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म ‘अय्यारी’ के एक सीन में इंटैलीजेंस विभाग के दो अफसरों की बातचीत के दौरान एक पूछता है-सर, जब दो देशों में इतने इंटैलीजैंट आदमी मौजूद हैं तो वे कशमीर का मसला हल क्यों नही कर लेते।?
तो इस पर दूसरा अफसर जवाब देता है-‘कशमीर एक मसला नहीं, एक इंडस्ट्री है, दोनों देशों के सियासतदानों के लिए....’
हम नहीं जानते कि इस प्रकार की हवायें पाकिस्तान के भीतर से चलती है या उनमें कहीं रास्ते में ज़हर घुल जाता है, मगर हम इतना
जरूर जानते हैं कि ये हवांये बहुधा अच्छी नहीं होतीं।
लेकिन पिछले दिनों सरहद के उस पार से हवाआंें के दो-तीन खुशबूदार झौंके आये। जिन लोगों को इनके बारे पता चला उन्होंने इसे जरूर महसूस किया है।
एक झौंका तब आया जब स्विटजर्लैंड के सैंट मौरिज में पाकिस्तान क्रिकेटर के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी अपने हिन्दुस्तानी फैंस के आग्रह पर उनके साथ फोटो खिंचवाने लगे। हुआ यूं कि एक हिंदुस्तानी लड़की के हाथ में तिरंगा झंडा पकड़ा हुआ था। वह उसे छुपाने का प्रयास करने लगी शायद यह सोच कर कि पाकिस्तानी क्रिकेटर को यह अच्छा न लगे।
मगर शाहिद अफरीदी ने उसकी इस बात को भांप लिया और उसने उस लड़की से तिरंगे को सामने फैलाने के लिये कहा। और तिरंगा सामने फैलाने के बाद बड़ी शान से उसने अपने हिंदुस्तानी चाहने वालों के साथ फोटो खिंचवाई। यही नहीं, अफरीदी ने कहा- ‘हमें एक दूसरे देशों के झण्डे का सम्मान करना चाहिये।
ऐसा करके शाहिद ने हिंदुस्तानियों का दिल जीत लिया। इस पूरी घटना की वीडियो मीडिया में वायरल हुआ । कुछ टीवी चैनलों ने भी इसे दिखाया। जिस ने भी मीडिया में देखा वह पाकिस्तान के इस खिलाड़ी की तारीफ किये बिना न रह सका।
वाह अफरीदी साहब ! आपने हमारे देश के झंडे का सम्मान किया । इसके उत्तर में हम आपके इस जज़्बे को सलाम करते हैं। आपने दोनों देशों के अवाम को एक बहुत बड़ा पैगाम दे दिया है।
दूसरी घटना राजस्थान के हिंदू परिवार की है जिन्होंने अपनी लड़की का रिश्ता पाकिस्तान में रह रहे एक हिन्दू परिवार के लड़के के साथ किया है। लड़के और उसके पिता को वीजा मिल गया परंतु मां का वीजा किसी कारण अटक गया था। हो सकता है बाद में हल हो गया हो।
हमारे एक-दो टीवी चैनलों ने इस खबर को संक्षिप्त रूप में दिखाया और यह भी बताया कि पाकिस्तान में रह रहे इस हिंदू लड़के का परिवार वहां बड़ी शानो-शौकत के साथ रह रहा है।
और तीसरा खुशबूदार हवा का झौंका तब आया जब पाकिस्तान में 38 वर्षीय कृष्णा कुमारी कोहली नाम की एक हिंदू लड़की को वहां की सीनेट का सदस्य चुना गया। वह पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) की ओर से उमीदवार थी। वहां की सीनेट को लगभग वे सभी शक्तियां प्राप्त हैं जो हमारे यहां लोकसभा को है। कृष्णा कुमारी पाकिस्तान में एक हिंदु दलित परिवार से संबंध रखती है जिनका परिवार स्वंतंत्रता सैनानी रहा है। उनके परिवार के एक व्यक्ति को 1858 में ब्रिटिश सरकार ने फांसी पर भी लटका दिया था।
इस प्रकार से यदा-कदा आने वाले समाचार हमारी कई धारणाओं को झुठला देते हैं।
हमारा मीडिया इस प्रकार की खबरें बहुत कम देता है और अगर देता भी है तो बहुत संक्षिप्त रूप में। ...अपनी-अपनी मजबूरियां होती हैं।
खैर, ऐसी हवाये ंहमेशा आती रहें। यही हमारी तमन्ना है। हमारी इच्छा है कि सरहद के दोनों ओर के आवाम खुश रहें।
और हां, चलते-चलते......
पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म ‘अय्यारी’ के एक सीन में इंटैलीजेंस विभाग के दो अफसरों की बातचीत के दौरान एक पूछता है-सर, जब दो देशों में इतने इंटैलीजैंट आदमी मौजूद हैं तो वे कशमीर का मसला हल क्यों नही कर लेते।?
तो इस पर दूसरा अफसर जवाब देता है-‘कशमीर एक मसला नहीं, एक इंडस्ट्री है, दोनों देशों के सियासतदानों के लिए....’
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