शुक्रवार, 8 जून 2018

प्रणव मुखर्जी की आर एस एस को खरी खरी


जब बिल्ली ने शेर के जबड़े पर मारा एक घूंसा

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     एक बार शेर ने बिल्ली को अपने घर आने का न्योता दिया। मकसद था जंगल में अपनी खुंखार छवि को सुधारना। क्योंकि शेर जंगल के जानवरों को बेवजह मारने के लिए काफी बदनाम हो चुका था।
    बड़ी आलोचना होने लगी बिल्ली की उसकी बिरादरी की बिल्लियों की ओर से। पर बिल्ली खामोश थी। उसने शेर का न्यौता स्वीकार कर लिया।

  नियत दिन बिल्ली शेर के घर पहुंची। खूब आवभगत हुई। शेर और शेरनी और बच्चों ने मिलकर उसकी खूब आवभगत की। बिल्ली के आगमन पर उन्होंने एक भव्य समारोह का आयोजन किया।
       शेर बिल्ली की प्रशंसा करते हुए बोला - बिल्ली, रिश्ते में तुम हमारी मौसी लगती हो। तुम्हारे और हमारे पूर्वज एक थे।  इसका प्रमाण यह है कि तुम्हारे और हमारे नैन नक्श आपस में कितने मिलते-जुलते हैं। नाक, मुंह, मूंछें, पूंछ सभी। तुम्हारा हमारा भोजन भी एक सा ही होता है। तुम अन्य जानवरों से भी श्रेष्ठ हो।
  बिल्ली सदियों से शेर की आदतों से वाकिफ थी।  वह जानती थी बिलियां होशियार होती हैं पर शेर की तरह मक्कार, धोखेबाज  नहीं होती ।
  बिल्ली बोली, शेर भैया तुम बहुत अच्छे हो।
 सुनकर शेर  बहुत खुश हुआ।
तभी बिल्ली ने एक जोरदार  घूंसा शेर के जबड़े पर मारा।
यह क्या मौसी ?  --शेर हक्का-बक्का हो कर पूछने लगा।
'मूर्ख इतना भी नहीं जानता। यह तेरे लिए तोहफा लाई हूं। तेरी मौसी हूं।'

'और सुन, मूर्ख,  तुझे जंगल में रहने का  शऊर सीखना होगा।
       'वह कैसे  मौसी ?  ' शेर पूछने लगा।
       ' वह यूं कि , जंगल सब का है, एक का नहीं। हाथी भालू गीदड़, खरगोश, बिल्ली, भेड़िए आदि सभी  इसी जंगल के निवासी हैं। तुम्हें उनके साथ प्यार से रहना चाहिए। जो इस जंगल में पैदा हुआ है, वह इसी जंगल का बेटा है।'
    शेर अपना जबड़ा सहलाने लगा। उसे समझ नहीं आ रही थी कि वह रोते या हंसे।
       घूंसे के बाद शेर का जबड़ा
कुछ टेढ़ा हो गया है। सुना है शेर आजकल अपने जबड़े सिंकाई कर रहा है।
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बुधवार, 30 मई 2018

हे राम!

 हे राम !

हे राम!
Praying man holding a cross in front of a bright light. Stock Photo - 3505443तुझको सलाम!
साॅरी!
मैं गलत बोल गया। 
ज़बान फिसल गई। 
मुझे दूसरे धर्म की भाषा नहीं बोलनी चाहिए थी।
तेरे भक्त नाराज़ हो जायेंगे। 
पता नहीं तुझको पसंद है या नहीं, 
पर तेरे भक्तों को पसंद नहीं है । 
मैं अपने शब्द वापिस लेता हूं । 

2.
हे राम !
एक बात तो बताओ !
क्या तुम केवल भाजपा के हो ?
बाकी हिंदुओं के नहीं ?
Little girl praying in the morning.Little asian girl hand praying,Hands folded in prayer concept for faith,spirituality and religion.Black
सिखों के नहीं ?
ईसाइयों के नहीं ?
मुस्लमानों के नहीं ?
दलितों के नहीं ?
मैंने सुना था घट-घट मे होता है राम !
तुम चुप क्यों हो ?
साॅरी !
मुझे अंदर की बात नहीं पूछनी चाहिए थीं ।

      --बलदेव  सिंह महरोक

बुधवार, 23 मई 2018

क्या भाजपा का रथ रुक गया है?

             क्या भाजपा का रथ रुक गया है?
          
           कर्नाटक  विधान सभा चुनावों के नतीजे आये और उम्मीदों के अनुरूप ही आये। मोदी और अमितशाह की ताबड़तोड़ रैलियों के बावजूद व  केंद्र में अपनी सरकार होने के बावजूद वे मात्र 104 सीटें ही जीत पाये जबकि दावा 150 का कर रहे थे। बस, उनके लिये अगर खुश होने की कोई  बात है तो वह यह कि उनकी सीटें 40 से बढ़कर 104 हो गई।
उधर कांग्रंस भी बिना किसी के साथ गठबंधन के अकेले ही चुनाव मैदान में उतरी। उन्होंने 78 सीटें जीतीं। बेशक वह बहुमत का आंकड़े तक नहीं पहुंच पायी परंतु एक सम्मानजनक आंकड़ा जरूर प्राप्त कर लिया। यही नहीं सम्मानजनक दूसरे अर्थों में भी था। क्योंकि वोट प्रतिशत भाजपा के वोट प्रतिशत से ज्यादा प्राप्त किया। भाजपा को 36.2 प्रतिशत ही मिले जबकि कांग्रेस को 38  प्रतिशत वोट मिले । यानि भाजपा से दो प्रतिशत वोट ज्यादा मिले। 2013 के चुनावों की तुलना में यदि उनका वोट प्रतिशत बढ़ा है तो वह उन्होंने जेडीएस से व अन्यों से छीना है। कांग्रेस ने भी दो प्रतिशत वोट दूसरों से छीना है।
2013  के चुनावों की तुलना में इस बार भाजपा ने बेशक ज्यादा सीटें हासिल की हों परन्तु इससे भाजपा को लिए खुश होने जैसी कोई बात नहीं है। क्योंकि केंद्र में उनकी सरकार है जिस नाते उनकी पार्टी को कुछ लाभ मिलना लाज़िमी था।  परंतु ना तो  मोदी जी का जादू काम कर पाया और न ही अमित शाह की कोई रणनीति।  इसलिए 2019 के चुनावों के लिए कुछ चिंता में तो डाल ही दिया है और अब उन्हें अपनी रणनीति में परिवर्तन करना पड़ेगा।
ल्ेकिन कांग्रेस ने बेशक बहुमत आंकड़ा पार नहीं किया है परंतु उन्हें जरूर खुश होना चाहिए। देश में जनता के एक बड़े भाग की सहानुभूति उनके साथ थी जो सोशल मीडिया से साफ पता चल रहा था।
इस चुनाव प्रचार में सबसे बड़ी बात जो देखने में आई कि जहां प्रधानमंत्री  मोदी जी और अमित शाह अपने भाषणों में सभी हदें पार करते दिखाई दिए जो उनके पद के अनुरूप नहीं थे, वहीं राहुल गांधी के चुनाव भाषण बहुत सधे हुए, शालीनता से भरे हुए और मर्यादा में रह कर थे। उनके भाषणों की सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होने अपने भाषणों में जब भी प्रधानमंत्री का नाम लिया, तो सम्मान के साथ लिया। खास बात यह थी कि उन्होंने कभी मोदी जी का मज़ाक नहीं उड़ाया जो उनकी नैतिकता के मापदंड से उन्हें ऊंचा उठाती है।   मनमोहन सिंह के भाषण तो हमेशा की तरह नपे-तुले शब्दों में होते ही हैं। उनके एक एक शब्द में वज़न होता है।  अन्य कांग्रेस नेताओं की ज़बान भी इस बार नहीं फिसली। इन सबका लाभ कांग्रेस को आने वाले चुनावों में मिलेगा।  2019 के लोकसभा के चुनावों के लिए उनके लिये एक साकारात्मक सूचक है।
  यूं भारतीय राजनीति एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ से गुज़र रही हैं, जब क्षे़त्रीय पार्टियां सत्ता में एक बड़ी भूमिका निभा रही है। चाहे बंगाल हो, बिहार हो, उत्तर प्रदेश हो, उड़ीसा हो, तामिलनाडु हो, या महाराष्ट्र हो या उत्तरी पूवी राज्य हों। पिछले कुछ वर्षों से क्षेत्रीय दल लगातार  मजबूत होते जा रहे हैं। हाल ही में एनडीए में भागीदार बहुत सारी सत्ताधारी पार्टियों का बीजेपी से धीरे-धीरे मोह भंग होता जा रहा है और वे अपना स्वतंत्र रास्ता अख्तियार कर रहीं हैं। दोनों राष्ट्रीय दल चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, भविष्य में क्षेत्रीय दलों के सहयोग के बिना केंद्र में उनके लिए सरकार बनाना मुश्किल होगा।
         
                    --बलदेव सिंह महरोक

रविवार, 13 मई 2018

शहीदों की चिताओं से वोटों की तलाश

  शहीदों की चिताओं 
 से वोटों की तलाश
      किसी प्रधानमंत्री के मुख से अगर शहीद भगत सिंह का नाम निकलता हैे तो थोडा ताजुब होना स्वाभाविक है।  चार साल में एक बार ही सही, मोदी जी के मुंह से भगत सिंह का नाम तो निकला, चाहे किसी बहाने ही सही। 
      कर्नाटक की एक चुनाव सभा में मोदी जी ने भगत सिंह का नाम कांग्रेस परिवार के साथ जोड़ कर लिया जो एक शुद्ध चुनावी भाषण था।  परंतु उसके पीछे कई मायने भी छिपे हुए थे।
      मोदी जी जनता से पूछा कि क्या कांग्रेस परिवार का कोई व्यक्ति भगत सिंह से जेल में मिलने गया था ? साथ ही उन्होंने यह स्वीकार भी किया  कि  उन्हें इतिहास का ज्यादा ज्ञान नहीं है। 
मोदी साहब का निशाना चाहे किसी पर भी हो, लेकिन एक सवाल उछालना था, उछाल दिया जिसके लिए वे माहिर माने जाते हैं। किसी ऐतिहासिक  पुरुष के नाम को वोटों में तबदील करने की कोशिश आप मोदी जी से सीख सकते हैं। भगत सिंह का नाम लेकर उन्होंने एक साथ तीन तीर छोड़े। अप्रत्यक्ष रूप से नेहरू पर वार करना चाहा। वीी सावरकर को याद किया, और साथ ही भविष्य के लिए भगत सिंह के नाम को वोटों के लिए भुनाने की संभावना की तलाश भी की। 
कांग्रेस परिवार के किसी व्यक्ति नेे कभी भगत सिंह से मुलाकात की थी या नहीं, यह तो इतिहास की किताबों में दर्ज है  परतंु इसके साथ कुंछ और सवाल भी पैदा होेते हैं कि  चार सालों तक आप कहां थे?आप ने अभी तक  भगत सिंह के साथ मुलाकात क्यों नहीं की ? भगत सिंह देश की राजधानी से मात्र 400 किलामीटर हुसैनी वाला में  राजगुरू और सुखदेव के साथ सोये हुए हैं। देश की जनता  के मन में भी एक सवाल आ रहा है कि आप  भगत सिंह की समाधि पर अभी तक क्यों नहीं गये। भगत सिंह के साथ-साथ स्वतंत्रता आंदोलन में अन्य  भी बहुत सारे क्रांतिकारी हुए हैं जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था ।  बटुकेश्वर दत्त, जतिन दास, लाला लाजपतराय, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाकउल्ला खां, आदि अनेकों स्वतंत्रता आंदोलन के सितारे अपनी-अपनी कब्रों में सोये हुए हैं। आपने कभी उनका हालचाल नहीं पूछा। नेता जी सुभाष चंद्र बोस को कभी याद किया। हमारे देश के असली मंदिर इन्हीं शहीदों की कब्रें हैं। देवी-देवताओं के मंदिरों के साथ-साथ शहीदों के इन मंदिरों पर भी कभी माथा टेकने की कोशिश नहीं की जिनके के कारण आज हम आज़ादी की हवा में सांस ले रहे हैं। हाा
यदि भगत सिंह का इतना ही ख्याल है तो, आज तक किसी  विश्वविद्यालय, या किसी किसी संस्थान, किसी सड़़क या किसी सरकारी योजना का नाम भगत सिंह या किसी अन्य क्रांतिकारी के नाम पर क्यों नहीं रखा गया।  ज्यादा दिन नहीं बीत,े जनता की ओर से नवनिर्मित मोहाली के हवाई अडडे ्का नाम भगत सिंह के नाम पर रखने की पुरजोर मांग की गई। परंतु मगर उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया।  और तो और, पाठ्यपुस्तकों में भी इन शहीदों से संबंधित अध्याय निकाले जाते रहे हैं।  मोदी जी ही को कयों दोष दें। बाकी दल भी तो  उसी थैली के चट्टे--बट्टे हैं।

          23 मार्च को भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव का जब  शहीदी दिवस आता है तो उसे पूर्ण रूप से अनेदेखा कर दिया जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर तो मनाने की ये लोग सोच भी नहीं सकते।  यदि सचमुच भगत सिंह से इतना प्यार है तो 23 मार्च को राष्ट्रीय दिवस मनाये जाने की घोषणा कर दीजिए ना।  हो सकता हैै  शायद भगत सिंह भी वोट बटोरने के लिए काम आ जायें।
                        -बलदेवसिह महरोक
    Email:   baldevmehrok@gmail.com


Seeking votes from Bhagat Singh's samadhi

  Seeking votes from the graves of Martyrs 
 
                          If the name of martyr Bhagat Singh comes out of the mouth of a Prime Minister, it is natural to be somewhat upbeat. Only once in four years, the name of Bhagat Singh came out of the mouth of Mr. Modi, even if no excuse is right.
                          In a election meeting in Karnataka, Modi ji associated Bhagat Singh with Congress family, which was a pure election speech. But there were many things hidden behind him.
Modi ji asked the public whether any person from the Congress family had gone to meet Bhagat Singh in jail? He also acknowledged that he did not have much knowledge of history.
                          Whatever the target of Modi sahab may be, but there was a question pounce, bounce, for which he is considered master. You can learn from Modi ji trying to change the name of any historical man in votes. With the name of Bhagat Singh, they left three arrows together. Indirectly wanted to strike Nehru. Remembered Veer Savarkar, and also for the future, the name of Bhagat Singh for the future was also looking for the possibility of redemption.
                            Whether a person from the Congress family had ever met Bhagat Singh or not, this is recorded in the books of history. With this there is a scam and questions arise that why you have not met with Bhagat Singh in the last four years. ? Bhagat Singh is sleeping with Rajguru and Sukhdev only in the 400-kilometer Hussaini Wala from the capital of the country. There is a question in the mind of the people of the country that why have not you gone to the Samadhi of Bhagat Singh so far? Along with Bhagat Singh, there have been many other revolutionaries in the freedom movement, who sacrificed everything for the country. The stars of many freedom fighters, such as Batukeshwar Dutt, Jatin Das, Lala Lajpat Rai, Chandrasekhar Azad, Ashfaqullah Khan, etc. have slept in their tombs. You never asked about them.
You never remembered  Netaji Subhash Chandra Bose The real temples of our country are the graves of these martyrs. Apart from temples of gods and goddesses, these temples of martyrs never even tried to take a forehead, because of which we are breathing in the air of independence today. 
         
           If Bhagat Singh has so much consideration, then why not mention any university, or any institute, any road or any government scheme in the name of Bhagat Singh or any other revolutionary till date. Not long ago, it was urgently demanded from the public to keep the name of the newly built Mohali airbase named after Bhagat Singh. But no attention was given to it. Moreover, in the textbooks, chapters related to these martyrs have been removed.What to say of Modi ji. All other parties are of the same virws.

             On March 23, when the martyrdom day of Bhagat Singh, Rajguru, Sukhdev comes, it is completely ignored. These people can not even think at the national level. If Bhagat Singh really is so much love then do not announce to celebrate National Day on March 23. Maybe Bhagat Singh may also work to get votes.
     
                                  -Baldev Singh Mehrok
                                    Email: baldevmehrok@gmail.com




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शुक्रवार, 4 मई 2018

कचरे के पहाड़ के दर्शन

                     कचरे के पहाड़ के दर्शन

हम में से बहुत सारे लोग कभी बस या अपने निजी वाहन में बैठकर करनाल -पानीपत के रास्ते दिल्ली जरूर गये होंगे।  ज्यों ही आप दिल्ली प्रवेश करते हैं, करनाल-बाईपास पर दुर्घंध का एक जोरदार भभाका आपका स्वागत करता है। आप इधर-उधर ताकने लगते हैं कि इतनी सड़ांध कहां से आ रही है।   
जनाब! ज़रा सड़क के उस तरफ बांई ओर नज़र दौड़ाइए। आप वहां एक ऊँचा पहाड़ सा देख रहे हैं। यह बदबू वहीं  से आ रही है। देखने में  यह पहाड़ी बहुत सुंदर लगती है। पर वास्तव में यह एक  कचरे का ढेर है। कचरे का यह ढेर सिर्फ एक नमूना है।  इस प्रकार के ढेर अन्य स्थानों पर भी  बताये जाते हैंै।
दिल्ली महानगर से निकलने वाला यह कचरा कुछ साल पहले सड़क की दूसरी ओर फैंका जाता था। वहां भी ऐसा पहाड़ सा बन गया था जिसे अब समतल कर पार्क आदि बना दिया गया है। वहां से बंद कर कर दिया तो इस स्थान पर फैंकवाना शुरू कर दिया जहां कुछ साल पहले दिल्ली की नालियों में निकलने वाला पानी जमा रहा करता था यद्यपि इसकी बगल में अब भी गंदे पानी की नदी सी  बहती दिखाई देती है।  यह कचरा देखते ही देखते  कुछ सालों में एक पहाड़ सा बन गया है।  जी.टी. रोड पर इस ओर से हर रोज़ लाखों लोग दिल्ली आते-जाते  हैं । कचरे का यह पहाड़ हर आने और जाने वाले का इसी प्रकार स्वागत किया करता है। आप नाक पर रुमाल रख लेते हैं। आपको उबकाई आने लगती है  और........ और  दिल्ली से जब आप बाहर निकलते हैं तो  यह पहाड पूरी बेशर्मी के साथ आपको कहता है कि ‘आपके पधारने का शुक्रिया!  मुझे सूंघने के लिए फिर आना।’ 
थोड़ी देर वहां रुक कर अगर आप हिम्मत बटोर सको तो- आपको वहां उपर कौवे  मण्डराते नजर आयेंगे और नीचे ढेर पर अनेकों कुत्ते अपना भोजन तलाशते दिखाई देते हैं ।  इन जानवरों के साथ-साथ बिना भेदभाव के बहुत सारे लड़के उस कचरे में से प्लास्टिक, खाली बोतलें, कागज आदि बीनते नज़र आयेंगे जिसे बेचकर वह अपना घर का खर्च चलाते हैं। कुल मिलाकर  एक अद्भुत सा नज़ारा आपको वहां देखने को मिलता है। टी.वी. वाले आपको यह दृश्य कभी नहीं दिखाते । इसके लिए आपको वहीं जाकर देखना पड़ेगा। 
कितना अच्छा लगता है भारत स्वच्छ अभियान के तहत  टीवी पर किसी नेता जी को हाथ में झाड़ू लेकर  कैमरे के सामने किसी चुनी हुई नुक्कड ़पर दो चार कागजों को बुहारते हुए फोटो खिचवाते देखकर। तब लगता है देश का कुड़ा करकट  अब साफ हो कर ही रहेगा । हमारी सरकारें  पिछले सालों में करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर खर्च कर  लोगों को यह बताने में जुटी हैं कि देश में कूड़ करकट साफ हो रहा है। परंतु हमारे रहनुमाओं को इस प्रकार के कचरे के पहाड़ कभी नजर नहीं आते। 
लेकिन शायद हम लोग भी अब कचरा सूंघने के आदि हो चुके हैं। इसीलिए हम कभी अपने सत्ताधारियों से, जिनको हम वोट दिया करते हैं, कभी शिकायत नहीं करते।  हमारी सूंघने की शक्ति अब इतनी क्षीण हो चुकी है कि हमें पता ही नहीं चलता कि यह कचरा है या और कुछ।

चलते -चलते -  
वह समय कब आयेगा जब हमारे प्रधानमंत्री इस कचरे के पहाड़ कि उपर खड़े हो कर देश की जनता को संबोधित करते हुए अपने मन की बात बतायेंगे।

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

क्या बैंकों में नोटों की कमी कृत्रिम थी ?

क्या बैंकों में नोटों की कमी कृत्रिम थी ?

क्या कभी यह माना जा सकता है कि देश के कुछ भागों में एकाएक करंसी नोटों की कमी हो जाये और बाकी हिस्से में न हो। और जब मीडिया में नोटों की कमी के बारे शोर मचने लगे और जनता में हड़कंप सा मचता दिखाई देने लगे तो अगले सप्ताह ही बैंको में दोबारा नोट भरे नज़र आयंे। 
हां कुछ ऐसा ही हुआ यहां भी। क्या यह अचंभा सा नहीं लगता। मीडिया के शोर मचाने पर सरकार द्वारा विपक्ष को और विपक्षी पार्टियों द्वारा सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा तब रिजर्व बैंक की तरफ से यहां तक  कि सरकार की तरफ से भी बयान आये कि नोटों की छपाई तेज कर दी गई है।
इस सारे घटनाक्रम में,  लोगों के मन में कई तरह-तरह के संदेह उत्पन्न होना लाज़िमी था । कुछ लोगों को यह हास्यस्पद भी लगा कि  एकाएक नोट कहां गायब गये।  सवाल उठने लगे कि अगर कमी हुई तो देश के कुछ हिस्से में ही क्यों? बाकी हिस्सों में क्यों नहीं । क्या यह रिजर्व बैंक की नाकामी  व अप्रबंधन के कारण हुआ या इसके पीछे कोई अन्य सोची समझी चाल थी। 
यहां एक बात गौर करने लायक है कि  यह कमी उन प्रदेशें की बैंकों में हुई जहां आम जनता नगद करंसी का ज्यादा प्रयोग करते हैं। 
क्या नोटबंदी के बाद ऐसा करके  सरकार मुद्रा पर कोई दोबारा तजुर्बा कर रही थी? क्या यह सरकार की कैशलेस इकनाॅमी को बढ़ावा देने की रणनीति का एक हिस्सा था? या फिर जैसे कि विपक्षी पार्टियां सरकार पर आरोप लगाती आई हैं, कृ़ित्रम कमी उत्पन्न करके  जनता का ध्यान किसी  अहम मुद्दे से हटाना था  ? या फिर यह दिखाना था कि देखिये, सरकार ने कितनी तत्परता दिखा कर स्थिति को संभाल लिया  और ़तुरंत नोटों की आपूर्ति शुरू कर दी। अचानक  नोटों की कमी हो जाना और फिर उसी तरह एकदम उनकी आपूर्ति भी हो जाना, यह सब सरकार की तरफ से दिये गये कारणों से मेल नहीं खाता। 
 लोगों द्वारा लगाये  गये तरह-तरह के कयासों में एक यह भी था  कि यह केवल नोटों की कृत्रिम कमी पैदा की गई थी ताकि लोग विवश हो कर डिजिटल  मुद्रा का उपयोग करने लगें। परंतु जब जनता में बदहवासी सी दिखाई देने लगी व सरकार को यह दांव उल्टा पड़ते दिखाई देने लगा,  तो  बैंकों में नोटों की सप्लाई फिर से शुरू कर दी जाने लगी।  
खैर, बैंकों में नोटों  की कमी तो अब नहीं रही परंतु  लोगों के मनों में बहुत से  प्रश्न अभी भी अनुतरित रह गये हैं। 



क्या बैंकों में नोटों की कमी कृत्रिम थी ?


क्या बैंकों में नोटों की कमी कृत्रिम थी ?
क्या बैंकों में नोटों की कमी कृत्रिम थी ?

क्या कभी यह माना जा सकता है कि देश के कुछ भागों में एकाएक करंसी नोटों की कमी हो जाये और बाकी हिस्से में न हो। और जब मीडिया में नोटों की कमी के बारे शोर मचने लगे और जनता में हड़कंप सा मचता दिखाई देने लगे तो अगले सप्ताह ही बैंको में दोबारा नोट भरे नज़र आयंे। 
हां कुछ ऐसा ही हुआ यहां भी। क्या यह अचंभा सा नहीं लगता। मीडिया के शोर मचाने पर सरकार द्वारा विपक्ष को और विपक्षी पार्टियों द्वारा सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा तब रिजर्व बैंक की तरफ से यहां तक  कि सरकार की तरफ से भी बयान आये कि नोटों की छपाई तेज कर दी गई है।
इस सारे घटनाक्रम में,  लोगों के मन में कई तरह-तरह के संदेह उत्पन्न होना लाज़िमी था । कुछ लोगों को यह हास्यस्पद भी लगा कि  एकाएक नोट कहां गायब गये।  सवाल उठने लगे कि अगर कमी हुई तो देश के कुछ हिस्से में ही क्यों? बाकी हिस्सों में क्यों नहीं । क्या यह रिजर्व बैंक की नाकामी  व अप्रबंधन के कारण हुआ या इसके पीछे कोई अन्य सोची समझी चाल थी। 
यहां एक बात गौर करने लायक है कि  यह कमी उन प्रदेशें की बैंकों में हुई जहां आम जनता नगद करंसी का ज्यादा प्रयोग करते हैं। 
  क्या नोटबंदी के बाद ऐसा करके  सरकार मुद्रा पर कोई दोबारा तजुर्बा कर रही थी? क्या यह सरकार की कैशलेस इकनाॅमी को बढ़ावा देने की रणनीति का एक हिस्सा था? या फिर जैसे कि विपक्षी पार्टियां सरकार पर आरोप लगाती आई हैं, कृ़ित्रम कमी उत्पन्न करके  जनता का ध्यान किसी  अहम मुद्दे से हटाना था  ? या फिर यह दिखाना था कि देखिये, सरकार ने कितनी तत्परता दिखा कर स्थिति को संभाल लिया  और ़तुरंत नोटों की आपूर्ति शुरू कर दी। अचानक  नोटों की कमी हो जाना और फिर उसी तरह एकदम उनकी आपूर्ति भी हो जाना, यह सब सरकार की तरफ से दिये गये कारणों से मेल नहीं खाता। 
                   लोगों द्वारा लगाये  गये तरह-तरह के कयासों में एक यह भी था  कि यह केवल नोटों की कृत्रिम कमी पैदा की गई थी ताकि लोग विवश हो कर डिजिटल  मुद्रा का उपयोग करने लगें। परंतु जब जनता
में बदहवासी सी दिखाई देने लगी व सरकार को यह दांव उल्टा पड़ते दिखाई देने लगा,  तो  बैंकों में नोटों की सप्लाई फिर से शुरू कर दी जाने लगी।  
खैर, बैंकों में नोटों  की कमी तो अब नहीं रही परंतु  लोगों के मनों में बहुत से  प्रश्न अभी भी अनुतरित रह गये हैं। 





 कितना अच्छा लगता है कितना अच्छा लगता है राजा को जब रियाया खड़ी होती है हाथ पसारे   उसके महल के द्वार पर कितना अच्छा लगता है राजा को जब रियाय...