शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

सरदार पटेल, देखोे आपके देश में क्या हो रहा है?



           सरदार पटेल, देखोे आपके देश में क्या हो रहा है?  


                            सरदार पटेल, आपको हम सब देशवासियों का नमन!

       आपको सबसे ऊंचे मंच पर खड़े देखकर खुशी हुई। 

       आप तो पहले भी सबसे ऊँचे थे। अब प्रतिमा के रूप में भी सबसे ऊँचे हैं। आपको स्टेच्यू आॅफ यूनिटी कहा गया है। आप सचमुच एकता के प्रतीक थे। यह खिताब आप से कोई नहीं छीन सकता। आप सब भारतीयों के थे। परंतु आपके तथाकथित चेलों चपाटों ने आपको अब एक सीमा में बांध दिया है।                    

         आपको बुत के रूप में एक जगह बांध कर खड़ा कर दया है। हमने आपके बुत का उद्घाटन होते देख,ा  परंतु  वहां किसी प्रकार की एकता के दर्शन नहीं हुए। आपको एक वर्ग तक सीमित कर दिया गया।  आपको वोट के लिये छीन लेने की कोशिश हो रही है। न वहां विपक्ष था, न वहां मुस्लिम या सिख या ईसाई दिखाई दिये। आपने भारत की रियासतों को भारत रूपी माला में पिरोया था। परंतु राज्यों का कोई प्रतिनिधि वहां नहीं था। क्या यह सब देखकर आपको बुरा नहीं लगा? हमने वहां पर आपके सिद्धांतों के परखचे उड़ते देखे। 

             सरदार! अब जब आप सबसे ऊँचे मंच पर खड़े हैं, तो आपको वहां खडे़-खडे पूरा भारत नजर आ रहा होगा। आप वहां खड़े देख रहे होंगे कि आपके भारत में क्या हो रहा है। आपके उद्घाटन की जब तैयारियां हो रही थी, उस समय पश्चिमी बंगाल के 24 परगना के एक गांव  में एक बाप अपनी दो महीने की दो जुड़वां बच्चियों को कुछ रूपयों के बदले बेच रहा था। कोई बाप यूं ही नहीं अपनी बेटियों को बेचता। तभी बेचता है जब उसके पास उन्हें खिलाने के लिए पैसे नहीं होते।

              सरदार! अपने चेलों से बस इतना कह देना कि उन्होंने आपके बुत पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च कियें हैं। कुछ रुपये देश की ऐसी बच्चियों के ऊपर भी खर्च कर दें ताकि किसी गरीब बाप को अपनी बेटी न बेचनी पड़े।

हे  सरदार!  आप अमर रहें,! अमरे रहें                                                              

                                                                                    -बलदेव सिंह महरोक



शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

झुमके की तलाश

                                                                                व्यंग्य   (Excuse me Sir!)
झुमके की तलाश
इस देश में बहुत से सवाल अनुत्तिरित पड़े हैं जो वर्षों से हल होने बाकी हैं। इनमें एक सवाल है झुमके का।
बात बरेली की है।   बहुत साल पहले लगभग 1965 में  इस शहर के एक बाजार में साधना का झुमका गिर गया था । वह कई दिनों तक वहां अपना झुमका ढूंढती रही थी, गली-गली, बाजार-बाजार। बाज़ारों में गाना गाते हुए। पर झुमका नहीं मिला। मिलता भी क्यों? लोग बड़े बेईमान होते है। कौन देता है इतना कीमती झुमका। वह भी अगर साधना का हो। 

यह तो उस समय की राज्य सरकार की जिम्मेवारी थी कि वह झुमका ढूंढ कर देती। राज्य सरकार अगर कामयाब न हो तो केंद्र सरकार की जिम्मेवारी थी । अगर फिर भी न मिलता तो सीबीआई जांच बैठाती, कोई आयोग बैठाती । परंतु सरकारें अक्सर वे काम नहीं करतीं जिनसे उनको वोट न मिलता हो। उत्तर प्रदेश में उसके पश्चात कई सरकारें आई,, चैधरी चरण सिंह की, चंद्र भानु गुप्ता की, सुचेता कृपलानी की,  कमलापति त्रिपाठी की,, एच.एन. बहुगुणा की,  एन डी तिवाड़ी की,  आर.एन.यादव, बनारसी दास, श्रीपति मिश्रा,  वीर बहादुर सिंह , वी.पी. सिंह,  कल्याण सिंह, मुलायम सिंह , राजनाथ सिंह, मायावती , अखिलेश यादव और अब अदित्य नाथ योगी की । लेकिन अभी तक वह झुमका गायब है। किसी ने परवाह नहीं की। आज अगर हेमा मालिनी का झुमका गिर जाता तो उसे ढूंढने के लिए भाजपा सरकार ऐड़ी-चोटी का जोर लगा देती। भाजपा सरकार की यही एक खासियत है।

पिछली बार जब मोदी जी बरेली गये थे तो  उन्होंने झुमके का जिक्र किया था।  अब फिर चुनाव आने वाले हैं । मोदी जी अपने भाषणों में कह सकते हैं कि कांगे्रस ने 60 सालों में क्या किया। जो  एक झुमका नहीं ढूंढ सकी । इतना पुराना गुम हुआ झुमका पांच साल में तो नहीं ढंूढा  नहीं जा सकता। कम से कम दस साल चाहिए। वे सन 2022 तक जरूर ढूंढ कर देंगे।

    अब समय आ गया है कि हम उस गुम हुए झुमके की तलाश करें। बरेली के मतदाताओं के लिए यह एक अच्छा मौका है कि वोट उसी पार्टी को देंगे  जो वायदा करेगी कि झुमका ढंूढ कर देगी।  यह बरेली के लोगों की नाक का ही सवाल नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश के की जनता की इज्जत का भी सवाल है जो वर्षों से बना हुआ है।
इंतज़ार करते हैं कि क्या होता है।
          --बलदेव सिंह महरोक






बुधवार, 19 सितंबर 2018

       अंधेर नगरी
(कोतवाल की कचहरी में)
-श्रीमान, शेल्टर होम में बच्चियों से रेप होता था।
-बहुत बुरी बात है।
- हां साहब।
-कौन चलाता था शेल्टर होम को।
-साहब एक नेता है । वही चलाता था।
 -उसे पकड़ कर लाओ।
-कैसे पकड़ें श्रीमान, नेता है वह। कानून का मालिक वही है। 

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-कहां होता था रेेप?
-इस बिल्डिंग मे।
-बिल्डिंग किसने बनाई थी।
 -साहब, ठेकेदार ने।
-ठेकेदार को पकड़ कर लाओ। 

4

-ठेकेदार! क्या यह बिल्डिंग तुमने बनाई है?
-साहब मैंनेे तो ठेका लिया था। बिल्डिंग तो मिस्त्री ने बनाई है।
-मिस्त्री को पकड़कर लाओ।

-साहब मिस्त्री हाजिर है।
-क्या यह बिल्डिंग तुमने बनाई थी।
-साहब, मैंने तो ईंट लगाई थीं, जो मुझे मजदूर ने दी थी। 
-ठीक है। मजदूर को पकड़ कर लाओ।
-साहब, मजदूर हाज़िर है। 
-क्यों रे, मिस्त्री को ईंटें तुमने पकड़ाई थी?
-जी सरकार।
-पर ईंटें मैंने नहीं बनाई थी। ईंटें तो भट्ठे  से आई थी। 
-भट्ठे वाले को बुलाओ। 
-साहब भट्ठे वाला हाजिर है। 
-तुमने कैसी ईंटें बनाई हैं?
-साहब, ईंटे तो पथेरे ने पाथी थीं,  मैंने नहीं। पूछ लो चाहे ।  मेरे साथ ही आया है। 
-क्यों रे पथेरे, ये ईंटे तुमने पाथी थीं ?
-जी सरकार।
-तुमने ऐसी ईंटें क्यों बनाई। 
-????
...........आर्डर,.. आर्डर...आर्डर..
सभी सबूतों के आधार पर इस पथेरे को सात साल बामुशक्कत कैद की सजा दी जाती है। 

सोमवार, 6 अगस्त 2018

Laghu Katha- पिकनिक

                                                    पिकनिक

सुबह का समय था।  कर्मचारी अपनी-अपनी डियूटी पर पहुंचे ही थे, और स्कूलों में अभी पहली घंटी ही बजी थी कि  रेडियो और चैनलों पर एक खबर प्रसारित होने लगी ।  देश के एक शीर्ष नेता का निधन हो गया था। सरकार ने उनके निधन पर सारे दश में सात दिन के शाोक की घोषणा कर दी थी। साथ में यह भी घोषणा की जा रही थी कि नेता जी को श्रद्वांजति स्वरूप आज का दिन सभी स्कूलों और सरकारी कायालयों में अवकाश कर दिया गया है।
छुट्टी की खबर सुन कर स्कूलों में विद्यार्थियों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा  वे अपने-अपने बस्ते उठा कर शोर मचाते हुए घरों की ओर भागन लगे कि चलो, आज का दिन मुफ्त में एक छुट्टी मिली।
इधर नीरज बाबू अभी कार्यालय में पहुंचे ही थे कि  यह खबर उनके कानों में पड़ी।  सुनते ही तुरन्त उन्होंने घर पर पत्नी को फोन किया-‘सुनो! दफतर में छुट्टी हो गई हैं। वह क्या है कि कोई नेता  प्लेन दुर्घटना में मर गया है। मैं जल्दी घर पहुंच रहा हूॅ। मौसम अच्छा है।  तुम बच्चों के साथ तैयार हो जाओ। आज हम पिकनिक मनाने चलेंगे। ’
और नीरज बाबू  ओठों को गोल गोल बनाकर सीटी बजाते हुए वापस  घर  जाने की तैयारी करने लगे।

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

नास्तिकों की संख्या हिंदू धर्म से ज्यादा

विश्व में नास्तिकों की संख्या हिंदू धर्म को मानने वालों की संख्या से ज्यादा

यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए विश्व में नास्तिकों की संख्या विश्व में हिन्दुओं की कुल जनसंख्या से ज्यादा है। कुछ दिनों पहलेे ‘नवभारत’ में छपी एक रिपोर्ट जो कि ‘एडिहेरेंटस डाॅट काॅम’ ओर पी यू रिसर्च से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित है, द्वारा विश्व में विभिन्न धर्मों को मानने वाली की संख्या इस प्रकार हैः-

विश्व की वर्तमान कुल जनसंख्या: लगभग सात अरब
1. ईसाई   -   220 करोड़  ;31.5 प्रतिशत
2. इस्लाम -   160 करोड़  ; 21 प्रतिशत
3. नास्तिक -  110 करोड़ ;15.35 प्रतिशत
3. हिन्दू   -  100 करोड़   ;13.95 प्रतिशत
4. चीनी पारंपरिक धर्म   -  39.4 करोड़
5. बौद्ध धर्म -        37.6 करोड
6. जातीय धार्मिक समूह  -  40 करोड़
7. सिख धर्म  -     2.3 करोड़
8. जैन धर्म -       42 लाख
9. शिंटो धर्म ; जापान - 40 लाख

परंतु 2011 में की गई  जनगणना के मुताबिक भारत में केवल 33004 ही नास्तिक ही दर्शाये गये हैं।  अर्थात 120 करोड़ जनता का केवल 0.0027 प्रतिशत।  ज्ञात रहे कि 2011 की जनगणना में पहली बार नास्तिकों की भी गणना की गई थी।

नास्तिकों को इन आंकड़ों को जानकर बहुत आश्चर्य हुआ है। निश्चय ही यह एक शरारतपूर्ण डाटा है।
‘भारत में लाखों की संख्या में ऐसे लोग  हैं जो किसी भी जाति अथवा धर्म में विश्वास नहीं रखते। वे प्रायः अपने आप को नास्तिक, तर्कवादी  मानते हैं या फिर किसी धर्म को न मानने वाले मानते हैं। यह कहना हैं’,  जी.विजयम का जो विजयवाड़ा में नास्तिक केंद्र के एक्सीक्यूटिव डायरेक्टर हैं।
‘जब आप यह कहते हैं कि नास्तिक केवल थोड़े से ही हैं तो आप वास्तविकता को तोड़-मरोड़ रहे हैं। यह रूढ़िवादियों और जनगणना अधिकारियों की शरारत है और इसे दुरुस्त करने की जरूरत है।’  विजयम ‘साईस एण्ड रैशनेलिस्ट  एसोसिएशन आॅफ इंडिया’  के प्रबीर घोष बताते हैं।
उन्होंने बताया कि जब जनगणना करने वाला कर्मचारीे उसके घर आया  तो घोष ने पूछा कि ‘आपने अपने रजिस्टर के धर्म के काॅलम में क्या लिखा है?’ तो कर्मचारी ने जवाब दिया ‘क्यो.ं?..हिन्दू..आप हिन्दू के हैं।  आप  हिन्दु नहीं हैं क्या? आपका उपनाम हिन्दू है।’ ‘इस पर मैंने  प्रोटेस्ट किया और बताया कि  मेरे नाम के सामने ‘नास्तिक’ लिखो। तो वह बीच में ही बोला कि इसके लिये तो उसे बहुत काट-पीट करनी पड़ेगी।’ यह सुनकर मैंने उससे वह कागज छीन लिया और उसमें लिखा ‘हिन्दू’ शब्द काट दिया’'', घोष बताते हैं।
श्री घोष एक कट्टड़ धार्मिक  बंगाली के रूप में पैदा हुए थे परन्तु व्यस्क होते ही उन्होंने एक रैशनेलिस्ट का रास्ता अपना लिया था। वे कहते हैं कि भारत में जनगणना वैज्ञानिक रूप से और ईमानदारी से नहीं की जाती।
जनगणना कितनी गलत है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है तामिलनाडू जैसे दृढ़ रैशनेलिस्ट  परम्परा वाले राज्य में में केवल 1297 नास्तिक दर्शाये गयेे हैं। द्राविड़ लिययक्का तामिझार परवई के सूबा वीरापांड्आन के अनुसार यह आंकड़ा बिल्कुल गलत है। वे कहते हैं कि  ‘केवल हमारे संगठन  के ही लगभग 2000 सदस्य हैं। जबकि हमारा संगठन तामिनाडु  सभी रैशनेलिस्ट आंदोलनों की जननी है।
विजयम ने अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि यह सब  हमारे देश में लोगों को जानकारी न होने के कारण बहुत सारे नागरिकों को यह ज्ञात ही नहीं है  ‘कोई जाति नहीं’ अथवा ‘कोई धर्म नहीं’  लिखवाने जैसा उनके पास विकल्प भी होता है। श्री विजयम के पिता ने एथीस्ट सैंटर  नामक एक नास्तिक केंद्र की स्थापना की थी । इस संगठन ने उन लोगों के लिए  जनगणना विषय परबहुत संघर्ष किया है  जो सरकारी फार्मों के जाति अथवा धर्म के कालम  में ‘कोई नहीं’ अथवा  ‘निल’ लिखवाते हैं परन्तु कर्मचारियों द्वारा अड़चनें डाली जाती हैं।
विजयम कहते हैं कि  लगभग 29 लाख लोग ऐसे हैं जो गणना कर्मचाारियों को अपना धर्म नहीं बताते क्योंकि वे किसी भी धर्म को नहीं मानते परन्तु अपने आप को नास्तिक भी नहीं कहते हैं। यह संख्या और भी ज्यादा हो सकती है।  
‘नास्तिक’ शब्द सुनने में अपने आप में एक बड़ा अजीब सा शब्द प्रतीत होता है। शायद इसीलिए  कुछ लोग किसी भी धर्म को न मानते हुए अपने आप को नास्तिक नहीं कहते क्योंकि जब हम अपने आप को एथीस्ट कहते हैं तो उन्हें समाज में या तो अविश्वास के  साथ देखा जाता या फिर बड़ी अजीब नज़रों से देखा जाता है। वास्तव में नास्तिकों को संख्या  हमारी सोच  से कहीं ज्यादा है। ऐसे अधिकतर लोग नास्तिक होते हुए भी समाज के रीति रिवाजों के दबावों का सामना नहीं कर पाते और मजबूरन उन्हें उनका साथ देना पड़ता है अथवा उनमें शामिल होना पड़ता है।

 - बलदेव सिंह महरोक

¹¹‘‘एडिहेरेंट्स डाॅट काॅम’ विश्व में धार्मिक व अन्य प्रकार के आंकड़े एकत्रित करने वाला एक प्रमुख साईट है। 

शनिवार, 14 जुलाई 2018

मन की बात

कहते हो तुम मन की बात  ।
पर होती नहीं है जन की बात ।

मैं ही मैं करते रहते हो
कभी तो कर लो 'हम' की बात ।

उदघाटन करते हो जो भी
वह तो है 'मनमोहन' की बात ।

बोर हुए वादों से तेरे
नहीं है इनमें 'दम' की बात ।

राष्ट्रवाद  का नारा देकर
भूल गये हो 'वतन' की बात ।

प्यारो मित्रों ...  कह भरमाया
करते हो 'दुश्मन' की बात ।
   
डमरू खूब बजाते हो तुम
ढमढमा ढम दिन और रात।

(यदि आप इस कविता में दिये गये विचारो से इत्तफाक रखते हैं तो इसे   
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और लाईक भी करें। - )

मंगलवार, 26 जून 2018

एमरजेंसी आज की तुलना में



                            एमरजेंसी आज की तुलना में 

-एमरजेंसी को पिछले 43 वर्षों में जितना बदनाम किया गया है, वास्तव में उस समय की स्थिति ऐसी नहीं थी।
-एमरजेंसी एक शुद्ध राजनीतिक फैसला था और लड़़ाई एक राजनेता की दूसरे राजनेताओं के बीच  थी।
-केवल अराजकता  फैलने के डर से ही नेताओं को जेल में डाला गया था।
-इनमें अधिकतर वे लोग शामिल थे जो सांप्रदयिक फैलाने की कोशिश करते रहते थे। मजहबों का ध्रुवीकरण करने में लगे रहते थे, और देश को बांटने की कोशिश करते रहते थे।
-आम नागरिक को जेलों में नही डाला गया था
- जनता को किसी प्रकार की असुविधा झेलनी नहीं पड़ी थी। यदि असुविधा हुई थी तो विपक्षी नेताओं को जो वर्षों से कांग्रेस के हाथों से सत्ता छीनने के लिए हाथ-पांव मार रहे थे।
-वास्तव में इंदिरा गांधी एक अयरन लेडी थी। एक वहीं नेता थी जिसने  अपनी दृढ़ शक्ति से पाकिस्तान को 1971 की जंग में हराया था और  उनके 90000 सैनिकों को कैद कर पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये थे। तथा पूर्वी पाकिस्तान ( अब बंगला देश) की ओर की सीमा  के सामरिक डर से देश को हमेशा के लिए राहत दिला दी थी। उस जैसी दृढ़ शक्ति वाली नेता सदियों में एक बार ही पैदा होता है।
-एमरजेंसी में बेशक कुछ समय के लिए नागरिकों के अधिकार  निलंबित कर दिए गये थे, और शक्ति सरकार के हाथ में आ गई थी,  परंतु व्यवहारिक रूप से जनता अपने मौलिक अधिकारों को ज्यों का त्यों उपयोग करती रही थी।
-आज की तुलना में देखा जाये तो जनता के अधिकार से कोई छोड़-छाड़ नहीं की गई थी।
-एमरजेंसी आम नागरिक के लिए केवल एक डर भर था जिससे देश में अनुशासन आ गया था।
-एमरजेंसी में धर्मों का ध्रुवीकरण नहीं होने दिया गया था। विभिन्न धर्मों के बीच कोई लकीर नहीं खींची गई थी। और जो लोग घृणा फैलाने की कोशिश करते थे, वे दुबक कर छुप गये थे।
-एमरजेंसी में किसी व्यक्ति को भीड़ ने नहीं मारा था।
-एमरजेंसी में किसी दलित पर कोई अत्याचार नहीं हुए थे।
1975 वर्ष की अगर आज के दौर से तुलना की जाये तो हम पाते हैं कि आज देश में  मानव अधिकारों का कहीं ज्यादा हनन हो रहा है। अराजक और सांप्रदायिक तत्व ज्यादा बेलगाम हो गये हैं। संविधान प्रदत्त शक्तियों को ज्यादा तोड़-मरोड़ कर उनका दुरुपयोग किया जाने लगा है। आज जब उन दिनों को याद किया जाता है तो हम देखते हैं कि आज जो  देश में घृणा की हवा दिन प्रतिदिन फैलती जा रही है, 1975 के वर्ष एमरजेंसी  के बावजूद भी  लोग आज  से ज्यादा सुख की सांस ले रहे थे।


 कितना अच्छा लगता है कितना अच्छा लगता है राजा को जब रियाया खड़ी होती है हाथ पसारे   उसके महल के द्वार पर कितना अच्छा लगता है राजा को जब रियाय...