शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

ये नेता लोग  इस  सम्मान के हकदार नहीं हैं

     विधानसभा से लेकर संसद तक जिन लोगों को हम देश का शासन चलाने के लिए भेजते हैं, जिन्हें हम लोकतंत्र की रक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपते हैं, जिन्हें हम देश के नागरिकों की रक्षा की जिम्मेदारी देते हैं, जिनसे हम हर नागरिक के लिए न्याय की आशा करते हैं, लेकिन बाद में ये लोग अपना कर्तव्य निर्वहन करने में असफल रहते हैं, और हमें पता चलता है कि इनमें से अधिकतर लोग बाहुबली, बलात्कारी,  हत्यारे, बदमाश, स्मगलर हैं, और हमें धोखा दे रहे हैं, तो क्या इनके नाम का संबोधन  करते  समय उनके नाम से पहले श्री लगाना चाहिए या इन्हें "जी" कहकर संबोधन करना चाहिए? क्या ये लोग "श्री" और  "जी" के हकदार हैं? ऐसे  लोग किसी भी तरह से इन सम्मान जनक शब्दों के हकदार नहीं हो सकते।
       इन लोगों को उनकी असली औकात जनता ही दिखा सकती है। ये जितने भी लोग हैं,  एक माननीय राष्ट्रपति को छोड़कर, इन लोगों को संबोधित करते समय, यथा लिखने में, बोलने में, भाषण आदि देते समय  इनके नाम से पहले  ''श्री” लगाना और बाद में "जी" लगाना छोड़ दीजिए। ये लोग इस सम्मान के हकदार नहीं हैं.. कदापि नहीं। ये लोग जनता के माई -बाप नहीं, सेवक हैं। इन्हें सेवक की तरह ही संबोधित कीजिए। जानते हो ना,  सेवक को कैसे संबोधित किया जाता है?..हूं.....?

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

आ गया है नया साल


आ गया है नया साल

बीत गया है 2018 भी 
यूं ही बीते कई साल
आ गया है नया साल

365 दिन तो यूं ही बीत गये 
पर हम न कर सके
ऐसा कोई कमाल
आ गया है नया साल

सपने देखते रहे वर्ष भर कबाब के
पर मंहगाई के दौर में 
मिली न हमें  दाल
आ गया है नया साल

सोचा था पैसे जोड़ कर, 
खरीदेंगे एक पाजामा 
खरीद पाये न पर इक रूमाल
आ गया है नया साल

सोचा था हम तो बड़े पहलवान हैं
पर तोड़ पाये ना  
किसी का एक बाल
आ गया है नया साल

यह ज़िंदगी है चार दिन की भाई
रख सको तो रख लो,
एक दूसरे का ख्याल
आ गया है नया साल

बारी आयेगी एक-एक करके सबकी
यहां न कोई बिग,
न कोई समाल
आ गया है नया साल

बिगडे़गा नहीं तुम्हारा कुछ
पूछ लोगे तुम भी अगर
दोस्तों का हाल
आ गया है नया साल

बीत बीत  कर बीत गये है 
न जाने कितने साल
आ गया है नया साल

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

बस इतना सा अंतर है चीन और भारत में

बस इतना सा अंतर है चीन और भारत में

  भारत के गुजरात में जब विश्व की सबसे ऊंची अर्थात 600 फुट ऊंची सरदार पटेल की मूर्ति लगाई जा रही थी तो दूसरी तरफ चीन  अपने शांक्शी प्रांत के  झियान  शहर में 330 फुट ऊंचा टावर बना कर खड़ा कर रहा था । यह विश्व का सबसे ऊंचा एयर प्यूरिफायर है जो दूषित हवा को साफ करता है और पूरे शहर की हवा को साफ रखता है व हर रोज 1 करोड़ घन मीटर हवा को साफ करता है

             हमारी मूर्ति सात किलोमीटर दूर से नजर आती है। चीन का वह टावर 10 किलोमीटर की परिधि से हवा साफ करता है। यह धूंए को सोख लेता है।
              यही अंतर है हमारे में और चीन में।

भारत के लोग अयोध्या में सबसे ऊंचीे राम की मूर्ति बनाने की योजना बना रहे हैं, उधर चीन ने एक कृ़ित्रम चंद्रमा बनाना शुरू कर दिया है जो सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके दिल्ली जैसे बड़े शहर को रात में रोशनी देगा। यह हमारे प्राकृतिक चंद्रमा से 8 गुना ज्यादा प्रकाश देगा, अर्थात सारे शहर में स्ट्रीट लाईट की जरूरत नहीं पड़ेगी और शहर रात को भी दिन की तरह चमकेगा। इससे उन्हें 1250 करोड़ रुपए प्त वर्ष की बचत होगी।   यही अंतर है हमारे में और चीन में ।
हमें गर्व है कि रामायण काल में श्री राम जी की सेना ने समुंद्र पर 30 किलोमीटर लम्बा श्रीलंका तक पुल बनाया था। परंतु चीन हमसे पीछे कैसे रहे। उसने  समुद्र पर 55 किलोमीटर लम्बाई का दुनिया का सबसे लम्बा पुल बना दिया है।
                    यहीं अंतर है भारत और चीन में। 

                 हम अपने देश में सूई  से लेकर  पटाखे तक छोटी-छोटी वस्तुएं भी चाईना से मंगवाते हैं और अपनी जनता को काम देने की बजाये उन्हें सबसिडी पर दो रूपये किलो गेहूं देकर हिंदु-मुस्लमान का खेल खिलाते हैं, परंतु चीन की जनता  छोटी-छोटी चीजें बना कर दुनिया भर में सप्लाई करने में व्यस्त रहती है और अपनी सरकार से नौकरियां नहीं मांगती।

                    बस इतना सा ही अंतर है हम में और चीन में ।

                                                                                             -बलदेव सिंह महरोक


शुक्रवार, 9 नवंबर 2018


     (कुछ हल्का- कुछ फुल्का)


125 रुपये का नोट

राम चन्द्र एक दुकान पर गया । वहां से 125 रुपये का सामान खरीदा। दुकानदार को उसने एक सौ का नोट, दो दस-दस के और एक पांच रुपये का नोट दिया। 
राम चंद्र सोच रहा था कि यदि उसके पास 125 रुपये का नोट होता तो उसे इतने मूल्य के चार नोट न देने पड़ते। पर उसे ध्यान आया कि 125 रुपये का नोट तो होता ही नहीं। यदि रिजर्व बैंक 125 रुपये का नोट भी निकाल देती तो कितना आसान होता, उसके लिए और जनता के लिए। ऐसे में सरकार को चार नोटों पर खर्चा न करना पड़ता बल्कि एक नोट से ही काम चल जाता। इसी प्रकार राम चन्द्र सोच रहा था कि अगर 25 रुपये का  नोट हो त ोइस मूल्य के लेन देन के लिए केवल एक ही नोट से काम चल जाता जबकि अब हमें 25 का लेनदेन करने के लिए या तो दस-दस के दो नोट और एक पांच रुपये का नोट अथवा एक बीस का और एक पांच का नोट या सिक्का देना पड़ता है।  भगुतान करने का यह एक निहायत ही असुविधाजनक  कार्य है। वास्तव में अभी तक हमारी मुद्रा के नोटों में पांच रुपये को जोड़ता हुआ कोई भी नोट रिजर्व बैंक द्वारा निकाला नहीं गया है। अतः भुगतान के लेन-देन में जनता को बहुत सी कठिनाइयां आती हैं। 
पिछले दिनों सोशल मीडिया पर 350/- रूप्यंे  के नोट के आने के बारे में नोट की तस्वीर वायरल हुई थी। लेकिन पता चला कि रिजर्व बैंक की ओर से ऐसा कोई नोट जारी करने की खबर नहीं है। 
किसी भी देश केंद्रीय बैंक की ओर से विभिन्न प्रकार के नोट इसलिए जारी किये जाते हैं कि जनता  सुविधजनक तरीका से  भुगतान कर सके। लेकिन हमारे यहां अभी भी बहुत सारे सुधार करने की आवश्यकता है। ज्यादा मुश्किल तब आती है जब 225, 125, 15, आदि का भुगतान करना होता है।
ऐसे मामलों में उस मूल्य का जोड़ बिठाते हुए हमें कई नोट देने पड़ते हैं। निश्चय ही सरकार का नोट छापने पर करोड़ों रुपया खर्चना पड़ता है। यदि उक्त बातों का ख्याल रख लिया जाये तो छपाई का काफी खर्चा बचाया  भी जा सकता है। 
चलते-चलतेः
   जब देश की जनसंख्या 125 करोड़ हो चुकी है तो सरकार को भी चाहिए इसका जश्न मनाते हुए 125 रुपये का नोट निकाला जाये। क्यों? सुझाव कैसा लगा ?









क्विता

मेदी जी अब गद्दी छोडो
देश को अब ज्यादाा ना तोड़ो
बहुत करी है देश की सेवा
बहुत खा लिया तुमने मेवा
बहुत बेचलिया राम को तुमने 
और किसी की आने दो
नही ंतो जनता आयेगी 
यहां से तुम्हें भगायेगी। 




                   2
 एक कदिनं अंकल जी  के यहां एक मेहमान आया। अंकल जी उन्हें मंदिर घुमाने ले गये। घर आये तो मैंने देखा अंकल जी उस मेहमान को चरखाचलाना सिख रहे थसे। 

              3
एक दिन अंकलजी मुझे कहने लगे आओ, मैं तुमहें बुलेट ट्रेन पर सैर करवाता हूं। 
स्च? मेने कहा
ळां,  औरवे मुझे एक जंगल में जे गये। ऊबड़ खबाड़ जमीन। 
टंकलन जीम ुझे आप कहां ले आये?
ैन परघुमाने लाया हूं
   प्र आप तेा मुझे जंगल में औार खेतों में ले आये हो। 
‘ःयहयीय तो कमाल है। यहीं से बुलेट ट्रेन गुजरेगी।
‘पर लाईन कहां है?
बेले, लाईन की कल्पना करो। कल्पना करो कि हयां से लाईन छि?ब्छी हुई ळै। लाईन प् र बुलेट ट्रेन दौड़ी चली जा रही है। और कल्पना करों के ट्रेन पर तुम बैठ
ै होष्’, 
  टाहा! म्जा आ रहा है ना।  हमारादेश कितनी उन्नति कर रहा है। 
हां, अंकल जी, मान गये ।       
लघु कथा -टीे
-ऐ बहन क्या कर रही हो
-करना क्या है। बोर हो रही हूं।
-मैं भी बोर हो रही थी।
-फिर क्या करें?
-चलो, मंदिर चलते हैं। 


-यार, गाय को पवित्र क्यों माना जाता है?
एक जानवर को पवित्र माना जाता है। आदमी को नही।
-क्योंकि गाया का दूध पीते हैं। उका गोबर लीपा जाता । क्या आदमी का गोबर लीप सकते हैं। 














कबीर खड़ा  बाजार में....
कबीर खड़ा बाजार में सबसे मांगे वोट
एक को गले लगाय के दूजे को दे चोट।
पांच साल तक पण्डों के संग, खाई खूब खीर
पड़ी जरूरत वोट की, आया याद कबीर।
कबीर खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर
एक से रखी दोस्ती एक से रखे बैर। 
आया पास कबीर के मुझको डालो वोट।
बात अगर मानी नहीं, देंगे गहरी चोट। 




















याद है मुझको वह गुजरा जमाना
बीते दिन 
अच्छे हो या बुरे 
ुकुछ सालो  बाद
जब याद आते हों तो, वे संघर्ष के दिन
 बीते दिनों के मित्र
अच्छे हो या बुरे
 कुछ सालों बाद
तो अच्दे लगते हैं
याद करके
कभी कभी  कसैले भी लगने लगते ळैं
 उनके कहे कटु शब्दल
जब कभी वे हमारा मजाक उड़ाया करते थे

बुरे लगते वे दिन किन्हीं अवसरों पर
 जो कीाी उन्होंने हमें कहे थे 
या फिर भी वेदिन अच्दे लगते हैं
ज्ब याद आते हैं वेउिदन क्यों कहे थे हमने उनको गलत शब्द
ब्हुत बुरे लगते हैं हम अपने आप को 
ज्ब याद आते हें वे पुराने दिन
ल्ेकिन सबसे अच्दे लगते हैं वे पुराने दिन
 ज्ब याद आते हैं हमें कुछ अच्छे मित्र
 म्नही मन हम उन्हें प्यार करते 
अच्छा लगता थनके साथ बैठेना गप्पें मारना
 अवसरों की तलाश में रहते थे हम
 उनके साथबातें करना 
या अवसरों की खोज करना 
ळमारा यह खोजी मन
 च्मक उठती थीं हमारे आंखे अचानक 
डनकोअपने सामने देख
 एक इतिहास होते सबके बीते हुए कल का
 जे कीाी लिखा नहीं जाता 
प्र उकरा रहता है जीवन पर्यंत हमारे मन पर
  किन्हीं पन्नों पर 
समय के साथ  
हमस ब ऐतिहासिक पुरुष हैं
  वह इतिस लिखानही जाता कागज के पन्ने पर और 
मर जाता है समय के साथ हमारे साथ ही 
हम सब पन्ना हैं इतिहास के एक बड़े ग्रंथ का। 



























मेरा बचपन

ओ मेरे बचपन
तू कभी लौट कर मत आना
मैं नहीं याद करना चाहता अपना बचपन
पिता की मार सहना
कभी खेले न थे साथियों के संग
मैं नही चाहता मुझे याद आयें
वे दिन
विषाद से भरे।
मैं नहीं चाहता मुझे याद आये वे दिन
मेरे शराबी बाप का मारना मेरी मां को, 
निकालना गालिया मां को
मैं देखता हूं अपनी कमर पर वे निशान
अपने बापू की मार के। 
मेरा बचपन कभी लौट कर मत आना।
मैं नहीं याद करना चाहता
उस बचपन को 
लच्छू हलवाई की दुकान पर
 जूठे कप धोते हुए उन मेरे नन्हें हाथों को। 
मैं नहीं याद करना चाहता 
उन बचपन के दिनों को
नहीं याद करना चाहता स्कूल ड्रेस में जाते हुए उन बच्चों को 
जो कभी देख लेते थे मेरे हाथों में जूठे कप। 


मैं नहीं चाहता  अपनी मां को 
शराबी बापू के हाथों पिटते हुए देखना
 नही  देखना चाहता हूं अपनी मां की आंखों में वह खौफ  
गिड़गिड़ाते हुए बापू के सामनेे। 
 नहीं सुनना चाहता मैं अपने बापू को कहते हुए
‘ओ हराम की औलाद’
कितनी बड़ी गाली थी वह
मेरी मां के लिए ।
ओ मेरे बचपन !
तू कभी लौट के मत आना मेरे लिए। 
मैं नहीं देखना चाहता भूखे अपनी मां को 
जो अपने हिस्से की रोटी मुझे खिला देती थी। 
और रहती थी खसुद भूखे। 
मैं पहनना नहीं चहता
किसी के उतरे कपड़े
जो लेकर आती थी मेरी मां
मेरी मुंह बोली मौसी के घर से। 
ओ मेरे बचपन
तु लौट क ेमत आना!
मैं नहीं चाहता  झूठ बोलना मास्टर जी के सामने
बहाने बना कि भूल गया मैं फीस लाना, 
मैं नहीं चाहता कि मांग कर पढ़ना किताबें अपने दोस्तों से। 
     

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

सरदार पटेल, देखोे आपके देश में क्या हो रहा है?



           सरदार पटेल, देखोे आपके देश में क्या हो रहा है?  


                            सरदार पटेल, आपको हम सब देशवासियों का नमन!

       आपको सबसे ऊंचे मंच पर खड़े देखकर खुशी हुई। 

       आप तो पहले भी सबसे ऊँचे थे। अब प्रतिमा के रूप में भी सबसे ऊँचे हैं। आपको स्टेच्यू आॅफ यूनिटी कहा गया है। आप सचमुच एकता के प्रतीक थे। यह खिताब आप से कोई नहीं छीन सकता। आप सब भारतीयों के थे। परंतु आपके तथाकथित चेलों चपाटों ने आपको अब एक सीमा में बांध दिया है।                    

         आपको बुत के रूप में एक जगह बांध कर खड़ा कर दया है। हमने आपके बुत का उद्घाटन होते देख,ा  परंतु  वहां किसी प्रकार की एकता के दर्शन नहीं हुए। आपको एक वर्ग तक सीमित कर दिया गया।  आपको वोट के लिये छीन लेने की कोशिश हो रही है। न वहां विपक्ष था, न वहां मुस्लिम या सिख या ईसाई दिखाई दिये। आपने भारत की रियासतों को भारत रूपी माला में पिरोया था। परंतु राज्यों का कोई प्रतिनिधि वहां नहीं था। क्या यह सब देखकर आपको बुरा नहीं लगा? हमने वहां पर आपके सिद्धांतों के परखचे उड़ते देखे। 

             सरदार! अब जब आप सबसे ऊँचे मंच पर खड़े हैं, तो आपको वहां खडे़-खडे पूरा भारत नजर आ रहा होगा। आप वहां खड़े देख रहे होंगे कि आपके भारत में क्या हो रहा है। आपके उद्घाटन की जब तैयारियां हो रही थी, उस समय पश्चिमी बंगाल के 24 परगना के एक गांव  में एक बाप अपनी दो महीने की दो जुड़वां बच्चियों को कुछ रूपयों के बदले बेच रहा था। कोई बाप यूं ही नहीं अपनी बेटियों को बेचता। तभी बेचता है जब उसके पास उन्हें खिलाने के लिए पैसे नहीं होते।

              सरदार! अपने चेलों से बस इतना कह देना कि उन्होंने आपके बुत पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च कियें हैं। कुछ रुपये देश की ऐसी बच्चियों के ऊपर भी खर्च कर दें ताकि किसी गरीब बाप को अपनी बेटी न बेचनी पड़े।

हे  सरदार!  आप अमर रहें,! अमरे रहें                                                              

                                                                                    -बलदेव सिंह महरोक



शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

झुमके की तलाश

                                                                                व्यंग्य   (Excuse me Sir!)
झुमके की तलाश
इस देश में बहुत से सवाल अनुत्तिरित पड़े हैं जो वर्षों से हल होने बाकी हैं। इनमें एक सवाल है झुमके का।
बात बरेली की है।   बहुत साल पहले लगभग 1965 में  इस शहर के एक बाजार में साधना का झुमका गिर गया था । वह कई दिनों तक वहां अपना झुमका ढूंढती रही थी, गली-गली, बाजार-बाजार। बाज़ारों में गाना गाते हुए। पर झुमका नहीं मिला। मिलता भी क्यों? लोग बड़े बेईमान होते है। कौन देता है इतना कीमती झुमका। वह भी अगर साधना का हो। 

यह तो उस समय की राज्य सरकार की जिम्मेवारी थी कि वह झुमका ढूंढ कर देती। राज्य सरकार अगर कामयाब न हो तो केंद्र सरकार की जिम्मेवारी थी । अगर फिर भी न मिलता तो सीबीआई जांच बैठाती, कोई आयोग बैठाती । परंतु सरकारें अक्सर वे काम नहीं करतीं जिनसे उनको वोट न मिलता हो। उत्तर प्रदेश में उसके पश्चात कई सरकारें आई,, चैधरी चरण सिंह की, चंद्र भानु गुप्ता की, सुचेता कृपलानी की,  कमलापति त्रिपाठी की,, एच.एन. बहुगुणा की,  एन डी तिवाड़ी की,  आर.एन.यादव, बनारसी दास, श्रीपति मिश्रा,  वीर बहादुर सिंह , वी.पी. सिंह,  कल्याण सिंह, मुलायम सिंह , राजनाथ सिंह, मायावती , अखिलेश यादव और अब अदित्य नाथ योगी की । लेकिन अभी तक वह झुमका गायब है। किसी ने परवाह नहीं की। आज अगर हेमा मालिनी का झुमका गिर जाता तो उसे ढूंढने के लिए भाजपा सरकार ऐड़ी-चोटी का जोर लगा देती। भाजपा सरकार की यही एक खासियत है।

पिछली बार जब मोदी जी बरेली गये थे तो  उन्होंने झुमके का जिक्र किया था।  अब फिर चुनाव आने वाले हैं । मोदी जी अपने भाषणों में कह सकते हैं कि कांगे्रस ने 60 सालों में क्या किया। जो  एक झुमका नहीं ढूंढ सकी । इतना पुराना गुम हुआ झुमका पांच साल में तो नहीं ढंूढा  नहीं जा सकता। कम से कम दस साल चाहिए। वे सन 2022 तक जरूर ढूंढ कर देंगे।

    अब समय आ गया है कि हम उस गुम हुए झुमके की तलाश करें। बरेली के मतदाताओं के लिए यह एक अच्छा मौका है कि वोट उसी पार्टी को देंगे  जो वायदा करेगी कि झुमका ढंूढ कर देगी।  यह बरेली के लोगों की नाक का ही सवाल नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश के की जनता की इज्जत का भी सवाल है जो वर्षों से बना हुआ है।
इंतज़ार करते हैं कि क्या होता है।
          --बलदेव सिंह महरोक






 कितना अच्छा लगता है कितना अच्छा लगता है राजा को जब रियाया खड़ी होती है हाथ पसारे   उसके महल के द्वार पर कितना अच्छा लगता है राजा को जब रियाय...