घोषणाएं और मूढ
मेरे एक मित्र ने एक दिन मुझसे पूछा कि ये घोषणाएं अक्सर रात को ही क्यों होती हैं। वह भी रात 8 बजे।
मैंने कहा कि रात 8 बजे का टाईम उचित होता है। खाने-पीने का टाईम होता है। मौसम सुहाना होता है। तभी मूढ़ बनता है। दिन को तो मूढ नहीं बनता। बिना मूढ बनाये कोई घोषणा नहीं हो सकती।
लेकिन मेरा निजी अनुभव है कि कभी-कभी घोषणा करके आदमी फंस भी जाता है। परंतु रास्ता निकालने वाले रास्ता निकाल ही लेते हैं।
ऐसा ही एक बार यूं हुआ कि रात को लगभग 8 बजे। मूढ बना हुआ था क्योंकि श्रीमती जी बड़े प्यार से अण्डे के भुर्जी बना कर सामने रख गई थी। मूढ में शायद मैं कोई घोषणा कर बैठा था। वह तो मुझे सवेरे पता चला जब श्रीमती जी ने कहा-मुझे हीरों का हार कब लेकर दोगे।
‘कैसा हार?’ मैंने आश्चर्य से पूछा।
‘आपने ही तो रात कहा था कि तुम्हें हीरों का हार लेकर दूंगा। मुझे अच्छी तरह याद है रात उस वक्त 8 बजे थे।
पगला गई हो क्या? हीरों के हार का सपना। मैं एक अदना सा क्लर्क और हीरों का हार?
‘रात आप मूढ़ में थे’, वह बोली।
‘ओह, तो यह बात है।
अब पता चला कि नशे मे क्या कह गया था। मुझे हल्का हल्का सा कुछ कुछ याद आया। ये झूठ नहीं बोल सकतीं। और न ही मैं इनकार कर सकता हूं।
‘हां जरूर कहा होगा, और अगर कहा था तो जरूर लेकर दूंगा।’
‘फिर कब लेकर दोग जी?’ वह पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रख कर बैठ गई। उसके चेहरे की चमक कुछ बढ़ गई ।
‘अरे भाई, इंतजार करो। मैंने यह तो नहीं कहा था सवेरे ही लेकर दूंगा। इंतजार करो । तुम तो जानती हो इन दिनों हमारी आर्थिक हालत अच्छी नहीं चल रही है। जब भी हमारे अच्छे दिन आयेंगे तुम्हें हीरों का हार जरूर लेकर दूंगा।
पिछले पांच सालों में श्रीमती जी कभी कभी हीरों के हार के बारे में याद दिला दिया करती हैं ।
--बलदेव सिंह महरोक
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