गुरुवार, 3 सितंबर 2020

लघु कथा: आत्म निर्भर

 आत्म निर्भर


अपनी ही धुन में मस्त  यू- ट्यूब पर  एक ताजा ताजा सुना हुआ गीत गुनगुनाता हुआ   वह गुसलखाने में दाखिल हो नहाने लगा । गुनगुनाने और ठिठुरने की आवाज़ बाहर तक भी आ रही थी। नहा चुकने के बाद पोंछने के लिए तौलिया देखने लगा। पर वह तो खूंटी पर नहीं था। याद आया तौलिया तो बाहर ही भूल आया था।

  थोड़ा सा दरवाजा खोल कछुए की भांति गर्दन बाहर निकाल कर  उसने श्रीमती जी को आवाज लगाई-  ज़रा तौलिया तो पकड़ा दो।

   एक हाथ में पकड़े हुए मोबाइल  पर नजरें गड़ाए गुस्से से तौलिया उसकी तरफ पटक कर जाते- जाते बोल गई-'आत्म निर्भर बनो।'

        --बलदेव सिंह महरोक

बुधवार, 2 सितंबर 2020

जब कलाकार कला से बेवफ़ाई करता है

 

जब कलाकार कला से बेवफाई करता है

एक कलाकार तभी तक कलाकारों की पांत में रहता है जब तक वह अपनी कला के प्रति वफादार रहता है। जब कोई कलाकर अपनी कला की सीमा को तोड़ कर किसी दूसरे क्षेत्र में घुसता है तो  तब वह धीरे धीरे अपने प्रशंसकों का विश्वास तोड़़ने लगता है और उनके मनों से दूर होता चला जाता है।
पिछले वर्षों के दौरान बहुत सारे फिल्मी सितारे जिनके करोड़ों की संख्या में प्रशंक थे, और अपने अभिनय से काफी नाम कमाया था, कुछ लालचवश व राजनीति के लोभ में किसी न किसी दल में घुस गये तो उनके प्रंशसकांेे को बहुत झटका लगा, और जो उनके मनों में उन कलाकारों के प्रति सम्मान था वह चक्नाचूर  हो गया।
अनुपम खैर एक बहुत शानदार फिल्मी कलाकर रहे। फिल्मों में उन्होंने अपनी अभिनय का खूब लोहा मनवाया था और करोड़ों लोगों के दिलों में स्थान बनाया था परंतु जब उन्होंने एक विशेष राजनीति दल के साथ अपनी प्रतिबद्धता जोड़ ली तो उनके चाहने वालों को बहुत  ठेस पहुंची। परिणाम यह हुआ कि उसके बाद जब उन्हें वह कलाकार न होकर उस विशेष दल का नेता नजर आता है। उनके मनों में उसके प्रति वह सम्मान नहीं रहा जो पहले हुआ करता था। उनकी फिल्मी कलाकार पत्नी किरण खैर ने भी राजनीति में घुस कर अपना वह सारा सम्मान खो दिया जो उन्होंने फिल्मों से अर्जित किया था।
धर्मेंद्र, हेमा मालिनी और बाद में उन्हीं का बेटा सनी देओल आदि फिल्म सितारों ने अपनी फिल्मों में यादगारी अभिनय किये हैें। परंतु विशेष पार्टी में शमिल हो उन्होंने वह सब खो दिया जो एक कलाकार के रूप में वर्षों की मेहनत के बाद प्राप्त  किया  था।
कुमार सानू और मनोज तिवाड़ी भी इसी श्रंखला के अगले पिटे हुए खिलाड़ी है। संगीत गायकी क्षेत्र में बेशक इनके गीत अभी भी लोगों की ज़ुबानों पर हैं परंतु किसी राजननीतिक दल के अपनी अपनी प्रतिबद्धता जोड़ कर मानोें उन्होंने अपने फैंस की भावनाओं के साथ बलात्कार कर दिया हो। भविष्य में ऐसे लोगों को कभी याद नहीं किया जाता। ऐसे लोगों पर एक धब्बा लग जाता है।
वर्षों पहले एक बार अमिताभ बच्चन ने भी इसी प्रकार की गलती की थी। जब अपने मित्र तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कहने पर वे कांग्रेस में शामिल हो गये थे और संसद सदस्य बन गये। परंतु जब राजनीति कि गंदी दलदल में फंसने लगे तो उन्हें जल्दी ही इसका अहसास हो गया। उन्हें महसूस हुआ कि वे गलत  क्षेत्र में आ गये हंै और अपनी कला से बहुत बड़ी बेवफाई कर रहे हैं। इसी अहसास को महसूस कर उन्होंने शीघ्र ही अपनी गलती सुधार ली और राजनीति को अलविदा कह कर फिर अपने फिल्मी कैरियर कीे वापिस मुड़ आये।  कला ने उन्हें अपने प्रति उनके वफादारी को बहुत बड़ा सम्मान दिया जो आज तक के फिल्मी इतिहास में बहुत कम कलाकारों को नसीब हुआ है।
इसी श्रंखला में राज बब्बर, शत्रुघ्न सिंहा, विनोद खन्ना आदि भी फिल्मी कैरियर के उतार के बाद राजनीति में शामिल हुए। राजनीति  में न तो वे ज्यादा सफल हुए, उल्टे वे अपने फिल्मी प्रशंसकों द्वारा भी लगभग भुला से दिये गये। इसी प्रकार अन्य अनेक क्षेत्रीय फिल्मों के कलाकाल अपना अभिनय छोड़ राजनीति में आते रहे और भुलाये जाते रहे। वे न इधर के रहे न उधर के और अन्धेरे में गुम हो गये।
हां, दक्षिण भारत के कुछ कलाकार अवश्य ही अपवाद सिद्ध हुए हैं और सफल हुए हैं। तामिलनाडु में जय ललिता अपने फिल्मी कैरियर के उतार पर थी तो राजनीति का दामन पकड़ा और एक सफल अभिनेत्री के साथ-साथ राजनीतिक नेता भी बनी। तमिलनाडु के ही रामाचंद्रन भी फिल्मों और राजनीति दोनें में सफल हुए। लेकिन ऐसा प्रायः बहुत कम लोगों को ही नसीब होता है।  


मंगलवार, 2 जून 2020

घोषणाएं और मूढ

घोषणाएं और मूढ

मेरे एक  मित्र  ने एक दिन मुझसे पूछा कि  ये घोषणाएं अक्सर रात को ही क्यों होती हैं। वह भी रात 8 बजे।

मैंने कहा कि रात 8 बजे का टाईम उचित होता है। खाने-पीने का टाईम होता है।  मौसम सुहाना होता है। तभी मूढ़ बनता है। दिन को तो मूढ नहीं बनता। बिना मूढ बनाये कोई घोषणा नहीं हो सकती।

लेकिन मेरा निजी अनुभव है कि कभी-कभी घोषणा करके आदमी फंस भी जाता है।  परंतु रास्ता निकालने वाले रास्ता निकाल ही लेते हैं।

    ऐसा ही एक बार यूं हुआ कि रात को लगभग 8 बजे।  मूढ बना हुआ था क्योंकि श्रीमती जी बड़े प्यार से अण्डे के भुर्जी बना कर सामने रख गई थी। मूढ में शायद मैं कोई घोषणा कर बैठा था। वह तो मुझे सवेरे पता चला जब श्रीमती जी ने कहा-मुझे हीरों का हार कब लेकर दोगे।

   ‘कैसा  हार?’ मैंने आश्चर्य से पूछा। 

  ‘आपने ही तो रात कहा था कि तुम्हें  हीरों का हार लेकर दूंगा। मुझे अच्छी तरह याद है रात उस वक्त 8 बजे थे।

    पगला गई हो क्या? हीरों के हार का सपना। मैं एक अदना सा क्लर्क और हीरों का हार?

‘रात आप मूढ़ में थे’, वह बोली।

        ‘ओह, तो यह बात है।

अब पता चला कि नशे मे क्या कह गया था। मुझे हल्का हल्का सा कुछ कुछ याद आया। ये झूठ नहीं बोल सकतीं। और न ही मैं इनकार कर सकता हूं।

    ‘हां जरूर कहा होगा, और अगर कहा था तो जरूर लेकर दूंगा।’

‘फिर कब लेकर दोग जी?’ वह पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रख कर बैठ गई। उसके चेहरे की चमक कुछ बढ़ गई ।

    ‘अरे भाई, इंतजार करो।  मैंने यह तो नहीं कहा था सवेरे  ही लेकर दूंगा। इंतजार करो । तुम तो जानती हो इन दिनों हमारी आर्थिक हालत अच्छी नहीं चल रही है। जब भी हमारे अच्छे दिन आयेंगे तुम्हें हीरों का हार जरूर लेकर दूंगा।

     पिछले पांच सालों में श्रीमती जी कभी कभी हीरों के हार के बारे में याद दिला दिया करती हैं ।
   --बलदेव सिंह महरोक

बुधवार, 18 सितंबर 2019

तेज दिमाग

बहस चली कि दिमाग किनका तेज होता है।
एक-      मांस खाना शरीर के लिए अच्छा नहीं होता। दूध पीना चाहिए। 
दूूसरा-    नहीं मांस खाने से शरीर बलिष्ठ होता है।  शेर मांस खाता है इसलिए तगड़ा होता है। अंग्रेज लोग मांस खाते हैं,  इसलिए  तगड़े होते हैं।  इसीलिएं तो ओलंपिक में सारे मैडल जीत ले जाते हैं।
       - पर दिमाग तो तेज नहीं होता ना।
       -उनका दिमाग भी तेज होता है।  आज तक सारे आविष्कार मांस खाने वाले ने किये है। वह भी गोमांस खाने वालों ने।
       -पर मांस खाना तो पाप है। और गोमांस खाना तो और भी महापाप है। 
        -आज तक गोमांस वालों को कभी पाप नहीं लगा।  उन्होंने ने दो सौ             साल तक गऊ मांस न खाने वालों पर शासन किया। आज भी वे                 हमारे से ज्यादा सम्पन्न हैं।
        -परंतु हमने अंग्रेजों से अपने देश को आजाद करवा लिया। दिमाग तो हमारा ही तेज हुआ ना।  ही...ही...ही.....।






क्या आप मुझे बता सकते हैं कि अपने देश में गधों की अगली जनगणना कब होगी?
और
इस समय गधों की जनसंख्या कितनी है----

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

ये नेता लोग  इस  सम्मान के हकदार नहीं हैं

     विधानसभा से लेकर संसद तक जिन लोगों को हम देश का शासन चलाने के लिए भेजते हैं, जिन्हें हम लोकतंत्र की रक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपते हैं, जिन्हें हम देश के नागरिकों की रक्षा की जिम्मेदारी देते हैं, जिनसे हम हर नागरिक के लिए न्याय की आशा करते हैं, लेकिन बाद में ये लोग अपना कर्तव्य निर्वहन करने में असफल रहते हैं, और हमें पता चलता है कि इनमें से अधिकतर लोग बाहुबली, बलात्कारी,  हत्यारे, बदमाश, स्मगलर हैं, और हमें धोखा दे रहे हैं, तो क्या इनके नाम का संबोधन  करते  समय उनके नाम से पहले श्री लगाना चाहिए या इन्हें "जी" कहकर संबोधन करना चाहिए? क्या ये लोग "श्री" और  "जी" के हकदार हैं? ऐसे  लोग किसी भी तरह से इन सम्मान जनक शब्दों के हकदार नहीं हो सकते।
       इन लोगों को उनकी असली औकात जनता ही दिखा सकती है। ये जितने भी लोग हैं,  एक माननीय राष्ट्रपति को छोड़कर, इन लोगों को संबोधित करते समय, यथा लिखने में, बोलने में, भाषण आदि देते समय  इनके नाम से पहले  ''श्री” लगाना और बाद में "जी" लगाना छोड़ दीजिए। ये लोग इस सम्मान के हकदार नहीं हैं.. कदापि नहीं। ये लोग जनता के माई -बाप नहीं, सेवक हैं। इन्हें सेवक की तरह ही संबोधित कीजिए। जानते हो ना,  सेवक को कैसे संबोधित किया जाता है?..हूं.....?

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

आ गया है नया साल


आ गया है नया साल

बीत गया है 2018 भी 
यूं ही बीते कई साल
आ गया है नया साल

365 दिन तो यूं ही बीत गये 
पर हम न कर सके
ऐसा कोई कमाल
आ गया है नया साल

सपने देखते रहे वर्ष भर कबाब के
पर मंहगाई के दौर में 
मिली न हमें  दाल
आ गया है नया साल

सोचा था पैसे जोड़ कर, 
खरीदेंगे एक पाजामा 
खरीद पाये न पर इक रूमाल
आ गया है नया साल

सोचा था हम तो बड़े पहलवान हैं
पर तोड़ पाये ना  
किसी का एक बाल
आ गया है नया साल

यह ज़िंदगी है चार दिन की भाई
रख सको तो रख लो,
एक दूसरे का ख्याल
आ गया है नया साल

बारी आयेगी एक-एक करके सबकी
यहां न कोई बिग,
न कोई समाल
आ गया है नया साल

बिगडे़गा नहीं तुम्हारा कुछ
पूछ लोगे तुम भी अगर
दोस्तों का हाल
आ गया है नया साल

बीत बीत  कर बीत गये है 
न जाने कितने साल
आ गया है नया साल

 कितना अच्छा लगता है कितना अच्छा लगता है राजा को जब रियाया खड़ी होती है हाथ पसारे   उसके महल के द्वार पर कितना अच्छा लगता है राजा को जब रियाय...