मंगलवार, 17 जुलाई 2018

नास्तिकों की संख्या हिंदू धर्म से ज्यादा

विश्व में नास्तिकों की संख्या हिंदू धर्म को मानने वालों की संख्या से ज्यादा

यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए विश्व में नास्तिकों की संख्या विश्व में हिन्दुओं की कुल जनसंख्या से ज्यादा है। कुछ दिनों पहलेे ‘नवभारत’ में छपी एक रिपोर्ट जो कि ‘एडिहेरेंटस डाॅट काॅम’ ओर पी यू रिसर्च से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित है, द्वारा विश्व में विभिन्न धर्मों को मानने वाली की संख्या इस प्रकार हैः-

विश्व की वर्तमान कुल जनसंख्या: लगभग सात अरब
1. ईसाई   -   220 करोड़  ;31.5 प्रतिशत
2. इस्लाम -   160 करोड़  ; 21 प्रतिशत
3. नास्तिक -  110 करोड़ ;15.35 प्रतिशत
3. हिन्दू   -  100 करोड़   ;13.95 प्रतिशत
4. चीनी पारंपरिक धर्म   -  39.4 करोड़
5. बौद्ध धर्म -        37.6 करोड
6. जातीय धार्मिक समूह  -  40 करोड़
7. सिख धर्म  -     2.3 करोड़
8. जैन धर्म -       42 लाख
9. शिंटो धर्म ; जापान - 40 लाख

परंतु 2011 में की गई  जनगणना के मुताबिक भारत में केवल 33004 ही नास्तिक ही दर्शाये गये हैं।  अर्थात 120 करोड़ जनता का केवल 0.0027 प्रतिशत।  ज्ञात रहे कि 2011 की जनगणना में पहली बार नास्तिकों की भी गणना की गई थी।

नास्तिकों को इन आंकड़ों को जानकर बहुत आश्चर्य हुआ है। निश्चय ही यह एक शरारतपूर्ण डाटा है।
‘भारत में लाखों की संख्या में ऐसे लोग  हैं जो किसी भी जाति अथवा धर्म में विश्वास नहीं रखते। वे प्रायः अपने आप को नास्तिक, तर्कवादी  मानते हैं या फिर किसी धर्म को न मानने वाले मानते हैं। यह कहना हैं’,  जी.विजयम का जो विजयवाड़ा में नास्तिक केंद्र के एक्सीक्यूटिव डायरेक्टर हैं।
‘जब आप यह कहते हैं कि नास्तिक केवल थोड़े से ही हैं तो आप वास्तविकता को तोड़-मरोड़ रहे हैं। यह रूढ़िवादियों और जनगणना अधिकारियों की शरारत है और इसे दुरुस्त करने की जरूरत है।’  विजयम ‘साईस एण्ड रैशनेलिस्ट  एसोसिएशन आॅफ इंडिया’  के प्रबीर घोष बताते हैं।
उन्होंने बताया कि जब जनगणना करने वाला कर्मचारीे उसके घर आया  तो घोष ने पूछा कि ‘आपने अपने रजिस्टर के धर्म के काॅलम में क्या लिखा है?’ तो कर्मचारी ने जवाब दिया ‘क्यो.ं?..हिन्दू..आप हिन्दू के हैं।  आप  हिन्दु नहीं हैं क्या? आपका उपनाम हिन्दू है।’ ‘इस पर मैंने  प्रोटेस्ट किया और बताया कि  मेरे नाम के सामने ‘नास्तिक’ लिखो। तो वह बीच में ही बोला कि इसके लिये तो उसे बहुत काट-पीट करनी पड़ेगी।’ यह सुनकर मैंने उससे वह कागज छीन लिया और उसमें लिखा ‘हिन्दू’ शब्द काट दिया’'', घोष बताते हैं।
श्री घोष एक कट्टड़ धार्मिक  बंगाली के रूप में पैदा हुए थे परन्तु व्यस्क होते ही उन्होंने एक रैशनेलिस्ट का रास्ता अपना लिया था। वे कहते हैं कि भारत में जनगणना वैज्ञानिक रूप से और ईमानदारी से नहीं की जाती।
जनगणना कितनी गलत है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है तामिलनाडू जैसे दृढ़ रैशनेलिस्ट  परम्परा वाले राज्य में में केवल 1297 नास्तिक दर्शाये गयेे हैं। द्राविड़ लिययक्का तामिझार परवई के सूबा वीरापांड्आन के अनुसार यह आंकड़ा बिल्कुल गलत है। वे कहते हैं कि  ‘केवल हमारे संगठन  के ही लगभग 2000 सदस्य हैं। जबकि हमारा संगठन तामिनाडु  सभी रैशनेलिस्ट आंदोलनों की जननी है।
विजयम ने अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि यह सब  हमारे देश में लोगों को जानकारी न होने के कारण बहुत सारे नागरिकों को यह ज्ञात ही नहीं है  ‘कोई जाति नहीं’ अथवा ‘कोई धर्म नहीं’  लिखवाने जैसा उनके पास विकल्प भी होता है। श्री विजयम के पिता ने एथीस्ट सैंटर  नामक एक नास्तिक केंद्र की स्थापना की थी । इस संगठन ने उन लोगों के लिए  जनगणना विषय परबहुत संघर्ष किया है  जो सरकारी फार्मों के जाति अथवा धर्म के कालम  में ‘कोई नहीं’ अथवा  ‘निल’ लिखवाते हैं परन्तु कर्मचारियों द्वारा अड़चनें डाली जाती हैं।
विजयम कहते हैं कि  लगभग 29 लाख लोग ऐसे हैं जो गणना कर्मचाारियों को अपना धर्म नहीं बताते क्योंकि वे किसी भी धर्म को नहीं मानते परन्तु अपने आप को नास्तिक भी नहीं कहते हैं। यह संख्या और भी ज्यादा हो सकती है।  
‘नास्तिक’ शब्द सुनने में अपने आप में एक बड़ा अजीब सा शब्द प्रतीत होता है। शायद इसीलिए  कुछ लोग किसी भी धर्म को न मानते हुए अपने आप को नास्तिक नहीं कहते क्योंकि जब हम अपने आप को एथीस्ट कहते हैं तो उन्हें समाज में या तो अविश्वास के  साथ देखा जाता या फिर बड़ी अजीब नज़रों से देखा जाता है। वास्तव में नास्तिकों को संख्या  हमारी सोच  से कहीं ज्यादा है। ऐसे अधिकतर लोग नास्तिक होते हुए भी समाज के रीति रिवाजों के दबावों का सामना नहीं कर पाते और मजबूरन उन्हें उनका साथ देना पड़ता है अथवा उनमें शामिल होना पड़ता है।

 - बलदेव सिंह महरोक

¹¹‘‘एडिहेरेंट्स डाॅट काॅम’ विश्व में धार्मिक व अन्य प्रकार के आंकड़े एकत्रित करने वाला एक प्रमुख साईट है। 

शनिवार, 14 जुलाई 2018

मन की बात

कहते हो तुम मन की बात  ।
पर होती नहीं है जन की बात ।

मैं ही मैं करते रहते हो
कभी तो कर लो 'हम' की बात ।

उदघाटन करते हो जो भी
वह तो है 'मनमोहन' की बात ।

बोर हुए वादों से तेरे
नहीं है इनमें 'दम' की बात ।

राष्ट्रवाद  का नारा देकर
भूल गये हो 'वतन' की बात ।

प्यारो मित्रों ...  कह भरमाया
करते हो 'दुश्मन' की बात ।
   
डमरू खूब बजाते हो तुम
ढमढमा ढम दिन और रात।

(यदि आप इस कविता में दिये गये विचारो से इत्तफाक रखते हैं तो इसे   
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और लाईक भी करें। - )

मंगलवार, 26 जून 2018

एमरजेंसी आज की तुलना में



                            एमरजेंसी आज की तुलना में 

-एमरजेंसी को पिछले 43 वर्षों में जितना बदनाम किया गया है, वास्तव में उस समय की स्थिति ऐसी नहीं थी।
-एमरजेंसी एक शुद्ध राजनीतिक फैसला था और लड़़ाई एक राजनेता की दूसरे राजनेताओं के बीच  थी।
-केवल अराजकता  फैलने के डर से ही नेताओं को जेल में डाला गया था।
-इनमें अधिकतर वे लोग शामिल थे जो सांप्रदयिक फैलाने की कोशिश करते रहते थे। मजहबों का ध्रुवीकरण करने में लगे रहते थे, और देश को बांटने की कोशिश करते रहते थे।
-आम नागरिक को जेलों में नही डाला गया था
- जनता को किसी प्रकार की असुविधा झेलनी नहीं पड़ी थी। यदि असुविधा हुई थी तो विपक्षी नेताओं को जो वर्षों से कांग्रेस के हाथों से सत्ता छीनने के लिए हाथ-पांव मार रहे थे।
-वास्तव में इंदिरा गांधी एक अयरन लेडी थी। एक वहीं नेता थी जिसने  अपनी दृढ़ शक्ति से पाकिस्तान को 1971 की जंग में हराया था और  उनके 90000 सैनिकों को कैद कर पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये थे। तथा पूर्वी पाकिस्तान ( अब बंगला देश) की ओर की सीमा  के सामरिक डर से देश को हमेशा के लिए राहत दिला दी थी। उस जैसी दृढ़ शक्ति वाली नेता सदियों में एक बार ही पैदा होता है।
-एमरजेंसी में बेशक कुछ समय के लिए नागरिकों के अधिकार  निलंबित कर दिए गये थे, और शक्ति सरकार के हाथ में आ गई थी,  परंतु व्यवहारिक रूप से जनता अपने मौलिक अधिकारों को ज्यों का त्यों उपयोग करती रही थी।
-आज की तुलना में देखा जाये तो जनता के अधिकार से कोई छोड़-छाड़ नहीं की गई थी।
-एमरजेंसी आम नागरिक के लिए केवल एक डर भर था जिससे देश में अनुशासन आ गया था।
-एमरजेंसी में धर्मों का ध्रुवीकरण नहीं होने दिया गया था। विभिन्न धर्मों के बीच कोई लकीर नहीं खींची गई थी। और जो लोग घृणा फैलाने की कोशिश करते थे, वे दुबक कर छुप गये थे।
-एमरजेंसी में किसी व्यक्ति को भीड़ ने नहीं मारा था।
-एमरजेंसी में किसी दलित पर कोई अत्याचार नहीं हुए थे।
1975 वर्ष की अगर आज के दौर से तुलना की जाये तो हम पाते हैं कि आज देश में  मानव अधिकारों का कहीं ज्यादा हनन हो रहा है। अराजक और सांप्रदायिक तत्व ज्यादा बेलगाम हो गये हैं। संविधान प्रदत्त शक्तियों को ज्यादा तोड़-मरोड़ कर उनका दुरुपयोग किया जाने लगा है। आज जब उन दिनों को याद किया जाता है तो हम देखते हैं कि आज जो  देश में घृणा की हवा दिन प्रतिदिन फैलती जा रही है, 1975 के वर्ष एमरजेंसी  के बावजूद भी  लोग आज  से ज्यादा सुख की सांस ले रहे थे।


गुरुवार, 21 जून 2018

A disussion on Misuse of Beaurocracy अफसरशाही का दुरुपयोग

  


   विपक्षी सरकारों को दबाने के लिए अफसरशही का दुरुपयोग एक खतरनाक खेल
1. भविष्य की सरकारों के लिए बोये जा रहे हैं कांटे। 
2. जनता के अंदर भाजपा के प्रति यह एक गलत संदेश।
3.  राष्ट्रीय राजनीति में ‘आप’ का कद भी बढ़ा। 

  दिल्ली में अफसरशाही का चुनी हुई सरकार के साथ सहयोग न करना, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बुलाने पर सरकारी मीटिंगों से जानबूझ कर अनुपस्थित रहना, और तरह-तरह के बहाने लगाकर सरकार के लिए संकट पैदा करना, नियमों को तोड़मरोड़कर संकट खड़े करना, फाईलों पर विपरीत टिप्पणियां लिखना  जैसी  प्रवृति लोकतंत्र में एक निहायत ही गलत परम्परा को जन्म दे रही है। 

              यह सही है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल  नहीं होने के कारण बहुत सारी प्र्रशासकनिक शक्तियां वहां के उप राज्यपाल के पास निहित हैं। परंतु दिल्ली की राज्य सरकार और उपराज्यपाल की शक्तियों का बटवारा स्पष्ट न होने के कारण केंद्र मे बैठी सरकार द्वारा गलत फायदा उठाया जा रहा है। केंद्र में भाजपा सरकार द्वारा उप राज्यपाल के माध्यम से इन शक्तियों का दुरुपयोग किये जाने के आरोप लगातार लग रहे हैें। 

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एलजी के सामने धरना देने का तरीका प्रथम दृष्टि में अटपटा सा जरूर लग सकता है  परंतु उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने हमेशा की तरह अपना विरोध  जताने के लिए  शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीका अपनाया । यही उनकी बड़ी विशेषता है कि वे अन्य दलांे के नेताओं की तरह  जनता को उकसाने जैसा कार्य नहीं करते बल्कि गांधीवादी सत्यग्रही तरीका अपनाते हैं ।

केंद्र में बैठी  भाजपा सरकार द्वारा जिस प्रकार अपने राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए प्रशासकनिक अधिकारियेां  व अन्य केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग किया जा रहा है,  यह निश्चय ही एक गलत परिपाटी डाली जा रही है। वह यह भूल रही है कि सरकारें आनी-जानी होती हैं। न ही केंद्र में सदैव भाजपा की सरकार रहेगी और न ही दिल्ली में सदा आम आदमी पार्टी की सरकार रहेगी। उनहे नहीं भूलना चाहिए किि दूसरे दल की सरकार आने पर भविष्यमें वे सब कठिनाइयां भाजपा की राज्य सरकारों को भी आ सकती हैं जो अब  गैर-भाजपा सरकारों को पेश आ रही हैं। 

जनता द्वारा चुनी हुई सरकार अपनी बनाई नीतियों को नौकरशाही की सहायता से ही लागू करवाती हैं परंतु यदि केंद्र में सत्तासीन कोई सरकार राज्य में विरोधी दलों के खिलाफ प्रशासनिक सेवा के अधिकरियों का इस्तेमाल करे, तो यह न केवल देश के लिए बल्कि उसके अपने लिए भी यह घातक होगा।
 

मंगलवार, 19 जून 2018

वन-महोत्सव Manaya Ja Raha Hai






         वन-महोत्सव









वन महोत्सव मनाया जा रहा है
एक मंत्री जी को बुलाया जा रहा है

लम्बे रास्ते को सजाया जा रहा है 
कुछ झौपड़ियों को हटाया जा रहा है

दस-बीस पेड़ों को कटाया जा रहा है 

वहाँ गमलों को सजाया जा रहा है

उँचे मंच पर बिठाया जा रहा है

फूलों का हार पहनाया जा रहा है

टी.वी. वालों को बुलाया जा रहा है

स्कूली बालाओं को नचाया जा रहा है

फिर उद्घाटन करवाया जा रहा है

एक पौधा लगाया जा रहा है


बैंड बाजा बजाया जा रहा है

जनता का दिल बहलाया जा रहा  है                     

बलदेव सिंह महरोक


रविवार, 17 जून 2018


नोटबंदी का भूत हमेशा डराता रहेगा भाजपा को।

                   आने वाले समय में  आज़ादी के बाद की दो काली घटनाएं देश की जनता  को याद रहेंगी जो हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुकी हैं। एक 1975 के इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई इमरजैंसी और दूसरी मोदी सरकार की 2016 की नोटबंदी।
                   बहुत ढंढोरा पीटा गया और खुद की ही पीठ थपथपाई गई कि काला धन बैंकों में आ चुका है। यह नहीं बताया गया कि कितना। जनता जब सवाल करती है कि कहां है वह काला धन तो उसे जो जवाब मिलता है वह कुछ इस तरह का होता हैै-अरे, क्या आप वित्तमंत्री से ज्यादा जानते हैं?
आओ, अब हमारे कालू सेठ के पास चलें जिसके पास एक करोड़ रूपये का काला धन उसकी तिजौरी में रखा था ।
,                  नोटबंदी का सरकारी फरमान आया। काले धन वाले कालू सेठ ने पुराने नोटों की शक्ल में रखे अपने काफी नोट बैंक वालों से मिल कर नये नोटों में बदलवा लिये। बाकी बचे नोट उसने कुछ नौकरों, कुछ जानकारों, कुछ मित्रों कुछ रिश्तेदारों के माध्यम से बैंकों से बदलवा लिये। काला धन सफेद नहीं हुआ, बल्कि नये नोटों की शकल में बदल कर फिर उसकी तिजौरी में वापिस आ गया। कालू सेठ को कोई फर्क नहीं पड़ा। वह उस धन को फिर उसे उसी प्रकार मार्कीट में इस्तेमाल कर रहा है। अपने व्यापार में, जमीन जायदाद खरीदने में, सोना खरीदने में। हां, यह जरूर है कुछ दिनों के लिए उसे इस्तेमाल करने की रफ़्तार जरूर कम हो गई थी।
                   इस तरह के कई कालू सेठ देश में हैं। किसी के पास कुछ करोड़ तो किसी के पास हज़ारो करोड़। किसी कालू सेठ को कोई फर्क नहीं पड़ा। अगर फर्क पड़ा तो शरीफ ईमादार लोगों को पड़ा, करोड़ों कारोबारियों, दुकानदारों, मजदूर वर्ग, और छोटे-छोटे कारोबार करने वालों को पड़ा।
                   अब देखिए राजनीतिक पार्टियों सहित सरकारी गुण्डागर्दी। पार्टियों को मिलने वाले चंदे को सम्पूर्ण बदनीयति से ‘सूचना के अधिकार’ से बाहर रखा गया है। परंतु किसी पार्टी ने कभी नहीं कहा कि इसको भी सूचना के अधिकार के अंदर रखो............चोर-चोर मसेरे भाई।
                    चुनाव आयोग ने भी साफ कर दिया है कि राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाला चंदा ‘सूचना के अधिकार’ की परिधि में नहीं आता। यानि उनके पास सैंकड़ों करोड़ रूपये का चंदा कहां से आया, किस विजय माल्या या नीरव मोदी या डालमिया या अडानी, फलानी, ढकानी ने दिया, वह काला है या सफेद। इसकी सूचना मांगने का अधिकार आप जनता को नहीं है। 
                    लेकिन दूसरी ओर 15-20 हज़ार रूपये महीना कमाने वाले किसी मोहन या सोहन ने इधर-उधर से 5-7 लाख रूपये इकट्ठा करके एक छोटा सा घर खरीद लिया है तो उसको उसका पूरा हिसाब देना ही पड़ेगा।
हमारी जनता को अपनी औकात में रहना होगा। उसे यह ध्यान रखना होगा कि वह सिर्फ जनता हैं, हुकमरान नहीं। उसका अधिकार बस इतना है कि वह पांच साल बाद होने वाले एक मजमे में जाकर एक बटन दबा दें जो टीं.. .. करेगा।
                                                                                 -बलदेव सिंह महरोक

गुरुवार, 14 जून 2018


File:Kim Jong-Un Photorealistic-Sketch.jpg

       विश्व का एक अद्भुत व्यक्तित्व किम
(किम इसलिए प्रशंसनीय है क्योंकि उसने विश्व के अन्य देशों के नेताओं की तरह अपने देश  को बेचा या गिरवी नहीं रखा ।)
               12 जून 2018 के दिन केे वे महत्वपूर्ण क्षण जब दुनिया के दो शत्रु देशों के नेताओं ने एक दूसरे से हाथ मिलाया मानो समय  कुछ  समय के लिये ठहर सा गया था। अत्यंत रोमांचक और सकून भरे क्षण थे वे। दुनिया के इतिहास में एक नया पन्ना जुड़ गया। मानव के सभ्य और बर्बरता के लम्बे इतिहास में मानव के सभ्य होने के लक्षण एक बार फिर  उजागर होते हुए प्रतीत हुए।
      एक तरफ दुनिया की लगभग एक सदी से दबंगता से दादागिरी  करते हुए अमेरिका का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और दूसरी ओर उसे वर्षों से चुनौती देने वाला एक छोटे से देश उत्तरी कोरिया का तानाशाह शासक  किम जुंग।  एक अद्भुत नज़ारा था टीवी पर देखने वालों के लिए। अपने देश की सुरक्षा की गारंटी लेकर  किम ने अपने प्रमाणु बम के  कार्यक्रम को बंद करने के समझौते पर हस्ताक्षर किये। ट्रंप ने 45 मिनट की बातचीत के पश्चात् जब उसके व्यक्तित्व को समझा परखा तो आखिर उसे कहना पड़ा कि किम एक बुद्धिमान और अपने देश को प्रेम करने वाला व्यक्ति है। अपने देश को प्रेम करना, उसकी सम्प्रभुता बनाये रखना ही किसी नेता की सबसे बड़ी ताकत होती है और वही ताकत किम जुंग में भी है। जो उसे इतने शक्तिशाली देश के सामने उसे चट्टान की तरह डटे रखती है।
       दुनिया के ये दोनों व्यक्तित्व जिन्होंने मनुष्य के सभ्य इतिहास को थोड़ा आगे सरकाया, इतिहास के पन्नों में दर्ज रहेंगे। किम इसलिए भी याद रहेगा कि उसके सामने अमेरिका जैसे दबंग देश की उसके देश की ओर आंख उठाने की हिम्मत नहीं हुई । किसी शासक की यह सबसे बड़ी विजय होती है। ट्रंप और किम दोनों के लिए इस समझौते को  न तो जीत कहा जा सकता है और न ही हार बल्कि मानव के सभ्य इतिहास की ओर एक और कदम ।
         इस सारी घटना से हटकर जो देखने वाली बात है वह यह है कि एक तरफ 71 साल के बूढ़ा ट्रंप  और दूसरी ओर उसके सामने उससे आधी आयु का 34 साल का किम जुंग उन।  जो 10337 किलोमीटर दूर दुनिया के सबसे शक्तिशाली देेश की नींद हराम किए रखता है और उसकी दादागिरी को धत्ता बता कर रखता है।  किम ने 2011 में उत्तरी कोरिया के शासक का पद संभाला था और इतने वर्षों के बाद भी अपने देश के आंतरिक और बाहरी विश्व के दबावों का मुकाबला करता हुआ किसी व्यक्ति के लिए  इतना आसान नहीं हैं शासक बने रहना। ऐसा व्यक्ति दुनिया के इतिहास में  अद्भुत ही माना जायेगा। किम कोरिया के उस परिवार से है जो सन् 1948 से उत्तरी कोरिया पर तानाशाही शासन करता चला आ रहा है। कोरिया जो 35 वर्षों तक जापान के अधीन रहा और जिसे विश्व युद्ध के पश्चात् मित्र देशों ने उस देश को दो भागों में बांट दिया, उसी प्रकार जिस प्रकार अंग्रेजों ने जाते जाते भारत के दो टुकड़े कर दिया थे यद्यपि दोनों की परिस्थितिया अलग अलग थीं। किम के दादा ने कोरिया के एकीकरण के लिये दक्षिणी कोरिया के खिलाफ युद्ध छेड़ा था।  इन वर्षों के दौरान अब तक दोनों कोरिया में कितनी जानें गईं अथवा कितनी अथर्क हानि हुई यह एक अलग विषय है परंतु  अपने देश की संप्रभुता को कायम  रखने के लिए छोटे देशों को अकसर ऐसी कुर्बानियां देनी पड़ती हैं।
        ऐसे समय में जब दुनिया के बड़े से बड़े देश भी अमेरिका को नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकते, किम का इस प्रकार डटे रहना उसके अंदर की अद्भुत शक्ति को दर्शाता है।
      भारत के मीडिया की तरह ही अमेरिका की दरोगाई में विश्व के मीडिया द्वारा किम को चाहे कितना भी बदनाम  किया जाता रहा हो, परंतु अमेरिका जैसी दबंग के सामने घुटने न टेकना और अपने देश की संप्रभुता को अक्षुण बनाये रखना किम जुंग को विश्व के महानतम् नेताओं के बीच खड़ा करती है।
     --बलदेव सिंह महरोक


 कितना अच्छा लगता है कितना अच्छा लगता है राजा को जब रियाया खड़ी होती है हाथ पसारे   उसके महल के द्वार पर कितना अच्छा लगता है राजा को जब रियाय...