मंगलवार, 9 सितंबर 2025

 कितना अच्छा लगता है

कितना अच्छा लगता है राजा को

जब रियाया

खड़ी होती है

हाथ पसारे  

उसके महल के द्वार पर


कितना अच्छा लगता है राजा को

जब रियाया गिड़गिड़ाती है

उसके सामने

एक रोटी के लिये


अच्छा लगता है उसे

तड़पती हुई रियाया को देख

भूख से

बिलबिलाते हुए

अच्छा लगता उसे

देखकर बच्चों के पिचके पेट

सूखी आंतड़ियां

और सांस लेते पिंजर

रोमांचक होता है उसके लिए  

देखकर लाशों को

गिद्धों द्वारा नोचते हुए

 

ऐसे में

जाग उठता है

उसका दानवीर मन

बहुत अच्छा लगता है उसे

ऊंचे मंच पर खड़े होकर

रोटियां फैंकना

अपनी रियाया की ओर

बहुत अच्छा लगता है उसे

देखकर उन्हें

उचक-उचक कर लपकते हुए

रोटियों की ओर.........

 (From my book "Baat Hai Par Chhoti Si")

सोमवार, 26 जुलाई 2021

हमारी बेटियां (देश की सभी बेटियों के नाम)

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हमारी बेटिया


     इस बार फिर ओलंपिक आया। हमारी बेटियों ने  फिर करिश्मा दिखाया और तमगे जीत लिये। और देश के नाम कर दिया। बधाइयां मिलने लगीं। पिछले रियो ओलंपिक में भी हमारी दो बेटियों ने तमगे जीते थे और देश की इज्जत बचाई थी। 

पता नहीं ये बेटिया कैसी होती हैं। किस मिट्टी की बनी होती हैं। अपनी मेहनत का श्रेय स्वयं कभी नहीं लेतीं। करती अपने दम पर हैं। नाम कर देती हैं मां-बाप का... अपने देश का या फिर भगवान के नाम कर देती हैं और मंदिर जाकर माथा टेकती हैं ....हे भगवान! तेरा धन्यवाद। तूने मुझे तमगा जितवा दिया...

 वाह! क्या कहने! हमने उनको सिखाया ही ऐसा है कि तुम अगर 'हो' तो दूसरों के दम पर हो।  तुम हमारा अहसान मानो कि हमने तुम्हें इस दुनिया में आने दिया। तुम्हें पालपोस कर बड़ा किया। इतना क्या कम है ... यह घर तुम्हारा नहीं है। तुम्हारा घर कोई और है। तुम दूसरों के लिये हो.....

  बेटियां जब पैदा होती हैं तो मां-बाप को अपनी बेटियों को बेटियां कहने में शरम आती हैं। वे कहते हैं- भगवान की यही मर्जी थी।

   कुछ ऐसा ही होता है हमारी बेटियों के साथ। बेटियों के पैदा होने पर कभी लड्डू या मिठाई नहीं बांटे जाती। कभी जश्न नहीं मनाए जाते....

       परन्तु जब तमगा जीत कर लाती हैं तब गर्व से कहने लगते हैं  -ये हमारी बेटियां हैं। प्रधानमंत्री ने कहा, मुख्यमंत्रियों ने कहा, मंत्रियों ने कहा, संतरियों ने भी कह दिया  -हमारी बेटियां। फिर ये देश की भी बेटियां बन जाती हैं। समाज के ठेकेदार जो कहते थे घर की दहलीज से बाहर पांव मत रखा करो!  वे अब बोल पड़े- देखो, हमारी बेटिया हैं। हमारी बेटियों ने किया है।

 इन को ये बेटियां उस समय नज़र नहीं आती जब ये संघर्ष कर रही होती हैं। तब कोई नहीं पूछता कि तुम्हें खाना भी मिलता है या नहीं । तुम्हारे पास पहनने के लिए ढंग के कपड़े भी हैं या नहीं।

     इनको बाकी बेटियों की भी कभी याद नहीं आती जो सुबह उठकर कूड़े के ढेर से प्लास्टिक बीनती हैं। न ही इनको उन बेटियों की याद आती है जिनको सुबह स्कूल जाना था परन्तु वे दूसरों के घरों में कूड़ा सफाई करने निकल जाती हैं और बर्तन मांजती हैं।  याद आयेगी भी नहीं क्योंकि इन लोगों की दृष्टि में प्लास्टिक बीनने वाली और बर्तन मांजने वाली बेटियां नहीं होतीं। वे सिर्फ इनके इस्तेमाल की चीज होती हैं। परंतु जब कभी तमगा लेकर आती हैं, तब वे  इनकी बेटियां बन जाती हैं।

अरे!  किधर जाना था किधर चलने लगा।  हमारी  बेटी ने तमगा जीत लिया। और भी जीतेंगी।   हमने इनको इनाम दे दिये। हमारी डियूटी पूरी। बधाई हो.

गुरुवार, 3 जून 2021

ओ राजा जी

 ओ राजा जी!

तुम हमारे राजा हो 

हम तुम्हारी प्रजा हैं 

तुम महलों में सोते हो?

हम खेतों में सोते हैं

तुम रजाई ओढ़ते हो

हम आसमान ओढ़ते हैं

तुम मन की बात करते हो

हम तन की बात करते हैं

तुम भाषण देते हो

हम राशन देते हैं 

तुम पूंजीपतियों के दूत हो

हम मिट्टी के पूत हैं 

तुम चार हो

हम चैंसठ करोड़ हैं 

ओ राजा जी! 

तुम जहां कील गाड़ोगे 

हम वहां फूल उगायेंगे

तुम हमें बौछार दोगे

हम उसमें नहा लेंगे 

तुम हमें गोली दोगे

हम उसे प्रसाद समझ खा लेंगे 

यह देश तुम्हारा भी है

यह देश हमारा भी है 

ओ राजा जी

तुम कैसे राजा हो

   

सोमवार, 18 जनवरी 2021

मी लार्ड

 मी लार्ड


- तुम दोनों आपस में शादी नही ंकर सकते।

- क्यों मी लाॅर्ड ? अं....अं..।

- तुम दोनों अलग-अलग धर्म के हो।

- परंतु मी लाॅर्ड, हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं।

- प्यार करना अलग बात है परंतु शादी करना अलग बात। शादी के लिए मैरिज एक्ट में धारा है। प्यार के लिए किसी एक्ट में कोई धारा नहीं है।

- लेकिन मी लाॅर्ड हम शादी करना चाहते हैं। हम एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते।

- तुम दोनों बिना विवाह किये इकट्ठे रह सकते हो। इसके लिए  कोई कानून नहीं है। परंतु शादी नहीं कर सकते ।

- मी लाॅर्ड, हम दोनों ने वह सब कर लिया हैैं जो एक पति पत्नी करते हैं। हम मम्मी- पापा बनने वाले हैं मी लाॅर्ड।

- तुम मम्मी-पापा बन सकते हो परंतु विवाह नही ंकर सकते। आर्डर इज़ आर्डर।

    कोर्ट इज़ एडजाॅंर्ड।

        

            -बलदेव सिंह महरोक

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

संस्मरण

 लगभग एक महीना पहले मैंने एक राज मिस्त्री और दो मजदूर अपने घर काम पर लगाये थे। तीन दिन काम करने के बाद एक मजदूर काम पर नहीं आया। पता करने पर  ज्ञात हुआ कि वह बीमार पड़ गया है।

कल किसी ने  मेरा दरवाजा खटखटाया तो सामने वही मजदूर खड़ा था। मुझे 50 रुपये वापिस करने आया था,  जो उसके पास ज्यादा चले गये थे। मेरे मना करने पर भी वह पैसे मुझे दे गया। उसने बताया कि वह कई दिन बीमार रहा।

इमानदारी की एक मिसाल। श्रध्दा से सिर  झुक गया।

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

लघु कथा: आत्म निर्भर

 आत्म निर्भर


अपनी ही धुन में मस्त  यू- ट्यूब पर  एक ताजा ताजा सुना हुआ गीत गुनगुनाता हुआ   वह गुसलखाने में दाखिल हो नहाने लगा । गुनगुनाने और ठिठुरने की आवाज़ बाहर तक भी आ रही थी। नहा चुकने के बाद पोंछने के लिए तौलिया देखने लगा। पर वह तो खूंटी पर नहीं था। याद आया तौलिया तो बाहर ही भूल आया था।

  थोड़ा सा दरवाजा खोल कछुए की भांति गर्दन बाहर निकाल कर  उसने श्रीमती जी को आवाज लगाई-  ज़रा तौलिया तो पकड़ा दो।

   एक हाथ में पकड़े हुए मोबाइल  पर नजरें गड़ाए गुस्से से तौलिया उसकी तरफ पटक कर जाते- जाते बोल गई-'आत्म निर्भर बनो।'

        --बलदेव सिंह महरोक

बुधवार, 2 सितंबर 2020

जब कलाकार कला से बेवफ़ाई करता है

 

जब कलाकार कला से बेवफाई करता है

एक कलाकार तभी तक कलाकारों की पांत में रहता है जब तक वह अपनी कला के प्रति वफादार रहता है। जब कोई कलाकर अपनी कला की सीमा को तोड़ कर किसी दूसरे क्षेत्र में घुसता है तो  तब वह धीरे धीरे अपने प्रशंसकों का विश्वास तोड़़ने लगता है और उनके मनों से दूर होता चला जाता है।
पिछले वर्षों के दौरान बहुत सारे फिल्मी सितारे जिनके करोड़ों की संख्या में प्रशंक थे, और अपने अभिनय से काफी नाम कमाया था, कुछ लालचवश व राजनीति के लोभ में किसी न किसी दल में घुस गये तो उनके प्रंशसकांेे को बहुत झटका लगा, और जो उनके मनों में उन कलाकारों के प्रति सम्मान था वह चक्नाचूर  हो गया।
अनुपम खैर एक बहुत शानदार फिल्मी कलाकर रहे। फिल्मों में उन्होंने अपनी अभिनय का खूब लोहा मनवाया था और करोड़ों लोगों के दिलों में स्थान बनाया था परंतु जब उन्होंने एक विशेष राजनीति दल के साथ अपनी प्रतिबद्धता जोड़ ली तो उनके चाहने वालों को बहुत  ठेस पहुंची। परिणाम यह हुआ कि उसके बाद जब उन्हें वह कलाकार न होकर उस विशेष दल का नेता नजर आता है। उनके मनों में उसके प्रति वह सम्मान नहीं रहा जो पहले हुआ करता था। उनकी फिल्मी कलाकार पत्नी किरण खैर ने भी राजनीति में घुस कर अपना वह सारा सम्मान खो दिया जो उन्होंने फिल्मों से अर्जित किया था।
धर्मेंद्र, हेमा मालिनी और बाद में उन्हीं का बेटा सनी देओल आदि फिल्म सितारों ने अपनी फिल्मों में यादगारी अभिनय किये हैें। परंतु विशेष पार्टी में शमिल हो उन्होंने वह सब खो दिया जो एक कलाकार के रूप में वर्षों की मेहनत के बाद प्राप्त  किया  था।
कुमार सानू और मनोज तिवाड़ी भी इसी श्रंखला के अगले पिटे हुए खिलाड़ी है। संगीत गायकी क्षेत्र में बेशक इनके गीत अभी भी लोगों की ज़ुबानों पर हैं परंतु किसी राजननीतिक दल के अपनी अपनी प्रतिबद्धता जोड़ कर मानोें उन्होंने अपने फैंस की भावनाओं के साथ बलात्कार कर दिया हो। भविष्य में ऐसे लोगों को कभी याद नहीं किया जाता। ऐसे लोगों पर एक धब्बा लग जाता है।
वर्षों पहले एक बार अमिताभ बच्चन ने भी इसी प्रकार की गलती की थी। जब अपने मित्र तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कहने पर वे कांग्रेस में शामिल हो गये थे और संसद सदस्य बन गये। परंतु जब राजनीति कि गंदी दलदल में फंसने लगे तो उन्हें जल्दी ही इसका अहसास हो गया। उन्हें महसूस हुआ कि वे गलत  क्षेत्र में आ गये हंै और अपनी कला से बहुत बड़ी बेवफाई कर रहे हैं। इसी अहसास को महसूस कर उन्होंने शीघ्र ही अपनी गलती सुधार ली और राजनीति को अलविदा कह कर फिर अपने फिल्मी कैरियर कीे वापिस मुड़ आये।  कला ने उन्हें अपने प्रति उनके वफादारी को बहुत बड़ा सम्मान दिया जो आज तक के फिल्मी इतिहास में बहुत कम कलाकारों को नसीब हुआ है।
इसी श्रंखला में राज बब्बर, शत्रुघ्न सिंहा, विनोद खन्ना आदि भी फिल्मी कैरियर के उतार के बाद राजनीति में शामिल हुए। राजनीति  में न तो वे ज्यादा सफल हुए, उल्टे वे अपने फिल्मी प्रशंसकों द्वारा भी लगभग भुला से दिये गये। इसी प्रकार अन्य अनेक क्षेत्रीय फिल्मों के कलाकाल अपना अभिनय छोड़ राजनीति में आते रहे और भुलाये जाते रहे। वे न इधर के रहे न उधर के और अन्धेरे में गुम हो गये।
हां, दक्षिण भारत के कुछ कलाकार अवश्य ही अपवाद सिद्ध हुए हैं और सफल हुए हैं। तामिलनाडु में जय ललिता अपने फिल्मी कैरियर के उतार पर थी तो राजनीति का दामन पकड़ा और एक सफल अभिनेत्री के साथ-साथ राजनीतिक नेता भी बनी। तमिलनाडु के ही रामाचंद्रन भी फिल्मों और राजनीति दोनें में सफल हुए। लेकिन ऐसा प्रायः बहुत कम लोगों को ही नसीब होता है।  


मंगलवार, 2 जून 2020

घोषणाएं और मूढ

घोषणाएं और मूढ

मेरे एक  मित्र  ने एक दिन मुझसे पूछा कि  ये घोषणाएं अक्सर रात को ही क्यों होती हैं। वह भी रात 8 बजे।

मैंने कहा कि रात 8 बजे का टाईम उचित होता है। खाने-पीने का टाईम होता है।  मौसम सुहाना होता है। तभी मूढ़ बनता है। दिन को तो मूढ नहीं बनता। बिना मूढ बनाये कोई घोषणा नहीं हो सकती।

लेकिन मेरा निजी अनुभव है कि कभी-कभी घोषणा करके आदमी फंस भी जाता है।  परंतु रास्ता निकालने वाले रास्ता निकाल ही लेते हैं।

    ऐसा ही एक बार यूं हुआ कि रात को लगभग 8 बजे।  मूढ बना हुआ था क्योंकि श्रीमती जी बड़े प्यार से अण्डे के भुर्जी बना कर सामने रख गई थी। मूढ में शायद मैं कोई घोषणा कर बैठा था। वह तो मुझे सवेरे पता चला जब श्रीमती जी ने कहा-मुझे हीरों का हार कब लेकर दोगे।

   ‘कैसा  हार?’ मैंने आश्चर्य से पूछा। 

  ‘आपने ही तो रात कहा था कि तुम्हें  हीरों का हार लेकर दूंगा। मुझे अच्छी तरह याद है रात उस वक्त 8 बजे थे।

    पगला गई हो क्या? हीरों के हार का सपना। मैं एक अदना सा क्लर्क और हीरों का हार?

‘रात आप मूढ़ में थे’, वह बोली।

        ‘ओह, तो यह बात है।

अब पता चला कि नशे मे क्या कह गया था। मुझे हल्का हल्का सा कुछ कुछ याद आया। ये झूठ नहीं बोल सकतीं। और न ही मैं इनकार कर सकता हूं।

    ‘हां जरूर कहा होगा, और अगर कहा था तो जरूर लेकर दूंगा।’

‘फिर कब लेकर दोग जी?’ वह पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रख कर बैठ गई। उसके चेहरे की चमक कुछ बढ़ गई ।

    ‘अरे भाई, इंतजार करो।  मैंने यह तो नहीं कहा था सवेरे  ही लेकर दूंगा। इंतजार करो । तुम तो जानती हो इन दिनों हमारी आर्थिक हालत अच्छी नहीं चल रही है। जब भी हमारे अच्छे दिन आयेंगे तुम्हें हीरों का हार जरूर लेकर दूंगा।

     पिछले पांच सालों में श्रीमती जी कभी कभी हीरों के हार के बारे में याद दिला दिया करती हैं ।
   --बलदेव सिंह महरोक

बुधवार, 18 सितंबर 2019

तेज दिमाग

बहस चली कि दिमाग किनका तेज होता है।
एक-      मांस खाना शरीर के लिए अच्छा नहीं होता। दूध पीना चाहिए। 
दूूसरा-    नहीं मांस खाने से शरीर बलिष्ठ होता है।  शेर मांस खाता है इसलिए तगड़ा होता है। अंग्रेज लोग मांस खाते हैं,  इसलिए  तगड़े होते हैं।  इसीलिएं तो ओलंपिक में सारे मैडल जीत ले जाते हैं।
       - पर दिमाग तो तेज नहीं होता ना।
       -उनका दिमाग भी तेज होता है।  आज तक सारे आविष्कार मांस खाने वाले ने किये है। वह भी गोमांस खाने वालों ने।
       -पर मांस खाना तो पाप है। और गोमांस खाना तो और भी महापाप है। 
        -आज तक गोमांस वालों को कभी पाप नहीं लगा।  उन्होंने ने दो सौ             साल तक गऊ मांस न खाने वालों पर शासन किया। आज भी वे                 हमारे से ज्यादा सम्पन्न हैं।
        -परंतु हमने अंग्रेजों से अपने देश को आजाद करवा लिया। दिमाग तो हमारा ही तेज हुआ ना।  ही...ही...ही.....।






क्या आप मुझे बता सकते हैं कि अपने देश में गधों की अगली जनगणना कब होगी?
और
इस समय गधों की जनसंख्या कितनी है----

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

ये नेता लोग  इस  सम्मान के हकदार नहीं हैं

     विधानसभा से लेकर संसद तक जिन लोगों को हम देश का शासन चलाने के लिए भेजते हैं, जिन्हें हम लोकतंत्र की रक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपते हैं, जिन्हें हम देश के नागरिकों की रक्षा की जिम्मेदारी देते हैं, जिनसे हम हर नागरिक के लिए न्याय की आशा करते हैं, लेकिन बाद में ये लोग अपना कर्तव्य निर्वहन करने में असफल रहते हैं, और हमें पता चलता है कि इनमें से अधिकतर लोग बाहुबली, बलात्कारी,  हत्यारे, बदमाश, स्मगलर हैं, और हमें धोखा दे रहे हैं, तो क्या इनके नाम का संबोधन  करते  समय उनके नाम से पहले श्री लगाना चाहिए या इन्हें "जी" कहकर संबोधन करना चाहिए? क्या ये लोग "श्री" और  "जी" के हकदार हैं? ऐसे  लोग किसी भी तरह से इन सम्मान जनक शब्दों के हकदार नहीं हो सकते।
       इन लोगों को उनकी असली औकात जनता ही दिखा सकती है। ये जितने भी लोग हैं,  एक माननीय राष्ट्रपति को छोड़कर, इन लोगों को संबोधित करते समय, यथा लिखने में, बोलने में, भाषण आदि देते समय  इनके नाम से पहले  ''श्री” लगाना और बाद में "जी" लगाना छोड़ दीजिए। ये लोग इस सम्मान के हकदार नहीं हैं.. कदापि नहीं। ये लोग जनता के माई -बाप नहीं, सेवक हैं। इन्हें सेवक की तरह ही संबोधित कीजिए। जानते हो ना,  सेवक को कैसे संबोधित किया जाता है?..हूं.....?

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

आ गया है नया साल


आ गया है नया साल

बीत गया है 2018 भी 
यूं ही बीते कई साल
आ गया है नया साल

365 दिन तो यूं ही बीत गये 
पर हम न कर सके
ऐसा कोई कमाल
आ गया है नया साल

सपने देखते रहे वर्ष भर कबाब के
पर मंहगाई के दौर में 
मिली न हमें  दाल
आ गया है नया साल

सोचा था पैसे जोड़ कर, 
खरीदेंगे एक पाजामा 
खरीद पाये न पर इक रूमाल
आ गया है नया साल

सोचा था हम तो बड़े पहलवान हैं
पर तोड़ पाये ना  
किसी का एक बाल
आ गया है नया साल

यह ज़िंदगी है चार दिन की भाई
रख सको तो रख लो,
एक दूसरे का ख्याल
आ गया है नया साल

बारी आयेगी एक-एक करके सबकी
यहां न कोई बिग,
न कोई समाल
आ गया है नया साल

बिगडे़गा नहीं तुम्हारा कुछ
पूछ लोगे तुम भी अगर
दोस्तों का हाल
आ गया है नया साल

बीत बीत  कर बीत गये है 
न जाने कितने साल
आ गया है नया साल

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

बस इतना सा अंतर है चीन और भारत में

बस इतना सा अंतर है चीन और भारत में

  भारत के गुजरात में जब विश्व की सबसे ऊंची अर्थात 600 फुट ऊंची सरदार पटेल की मूर्ति लगाई जा रही थी तो दूसरी तरफ चीन  अपने शांक्शी प्रांत के  झियान  शहर में 330 फुट ऊंचा टावर बना कर खड़ा कर रहा था । यह विश्व का सबसे ऊंचा एयर प्यूरिफायर है जो दूषित हवा को साफ करता है और पूरे शहर की हवा को साफ रखता है व हर रोज 1 करोड़ घन मीटर हवा को साफ करता है

             हमारी मूर्ति सात किलोमीटर दूर से नजर आती है। चीन का वह टावर 10 किलोमीटर की परिधि से हवा साफ करता है। यह धूंए को सोख लेता है।
              यही अंतर है हमारे में और चीन में।

भारत के लोग अयोध्या में सबसे ऊंचीे राम की मूर्ति बनाने की योजना बना रहे हैं, उधर चीन ने एक कृ़ित्रम चंद्रमा बनाना शुरू कर दिया है जो सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके दिल्ली जैसे बड़े शहर को रात में रोशनी देगा। यह हमारे प्राकृतिक चंद्रमा से 8 गुना ज्यादा प्रकाश देगा, अर्थात सारे शहर में स्ट्रीट लाईट की जरूरत नहीं पड़ेगी और शहर रात को भी दिन की तरह चमकेगा। इससे उन्हें 1250 करोड़ रुपए प्त वर्ष की बचत होगी।   यही अंतर है हमारे में और चीन में ।
हमें गर्व है कि रामायण काल में श्री राम जी की सेना ने समुंद्र पर 30 किलोमीटर लम्बा श्रीलंका तक पुल बनाया था। परंतु चीन हमसे पीछे कैसे रहे। उसने  समुद्र पर 55 किलोमीटर लम्बाई का दुनिया का सबसे लम्बा पुल बना दिया है।
                    यहीं अंतर है भारत और चीन में। 

                 हम अपने देश में सूई  से लेकर  पटाखे तक छोटी-छोटी वस्तुएं भी चाईना से मंगवाते हैं और अपनी जनता को काम देने की बजाये उन्हें सबसिडी पर दो रूपये किलो गेहूं देकर हिंदु-मुस्लमान का खेल खिलाते हैं, परंतु चीन की जनता  छोटी-छोटी चीजें बना कर दुनिया भर में सप्लाई करने में व्यस्त रहती है और अपनी सरकार से नौकरियां नहीं मांगती।

                    बस इतना सा ही अंतर है हम में और चीन में ।

                                                                                             -बलदेव सिंह महरोक


शुक्रवार, 9 नवंबर 2018


     (कुछ हल्का- कुछ फुल्का)


125 रुपये का नोट

राम चन्द्र एक दुकान पर गया । वहां से 125 रुपये का सामान खरीदा। दुकानदार को उसने एक सौ का नोट, दो दस-दस के और एक पांच रुपये का नोट दिया। 
राम चंद्र सोच रहा था कि यदि उसके पास 125 रुपये का नोट होता तो उसे इतने मूल्य के चार नोट न देने पड़ते। पर उसे ध्यान आया कि 125 रुपये का नोट तो होता ही नहीं। यदि रिजर्व बैंक 125 रुपये का नोट भी निकाल देती तो कितना आसान होता, उसके लिए और जनता के लिए। ऐसे में सरकार को चार नोटों पर खर्चा न करना पड़ता बल्कि एक नोट से ही काम चल जाता। इसी प्रकार राम चन्द्र सोच रहा था कि अगर 25 रुपये का  नोट हो त ोइस मूल्य के लेन देन के लिए केवल एक ही नोट से काम चल जाता जबकि अब हमें 25 का लेनदेन करने के लिए या तो दस-दस के दो नोट और एक पांच रुपये का नोट अथवा एक बीस का और एक पांच का नोट या सिक्का देना पड़ता है।  भगुतान करने का यह एक निहायत ही असुविधाजनक  कार्य है। वास्तव में अभी तक हमारी मुद्रा के नोटों में पांच रुपये को जोड़ता हुआ कोई भी नोट रिजर्व बैंक द्वारा निकाला नहीं गया है। अतः भुगतान के लेन-देन में जनता को बहुत सी कठिनाइयां आती हैं। 
पिछले दिनों सोशल मीडिया पर 350/- रूप्यंे  के नोट के आने के बारे में नोट की तस्वीर वायरल हुई थी। लेकिन पता चला कि रिजर्व बैंक की ओर से ऐसा कोई नोट जारी करने की खबर नहीं है। 
किसी भी देश केंद्रीय बैंक की ओर से विभिन्न प्रकार के नोट इसलिए जारी किये जाते हैं कि जनता  सुविधजनक तरीका से  भुगतान कर सके। लेकिन हमारे यहां अभी भी बहुत सारे सुधार करने की आवश्यकता है। ज्यादा मुश्किल तब आती है जब 225, 125, 15, आदि का भुगतान करना होता है।
ऐसे मामलों में उस मूल्य का जोड़ बिठाते हुए हमें कई नोट देने पड़ते हैं। निश्चय ही सरकार का नोट छापने पर करोड़ों रुपया खर्चना पड़ता है। यदि उक्त बातों का ख्याल रख लिया जाये तो छपाई का काफी खर्चा बचाया  भी जा सकता है। 
चलते-चलतेः
   जब देश की जनसंख्या 125 करोड़ हो चुकी है तो सरकार को भी चाहिए इसका जश्न मनाते हुए 125 रुपये का नोट निकाला जाये। क्यों? सुझाव कैसा लगा ?









क्विता

मेदी जी अब गद्दी छोडो
देश को अब ज्यादाा ना तोड़ो
बहुत करी है देश की सेवा
बहुत खा लिया तुमने मेवा
बहुत बेचलिया राम को तुमने 
और किसी की आने दो
नही ंतो जनता आयेगी 
यहां से तुम्हें भगायेगी। 




                   2
 एक कदिनं अंकल जी  के यहां एक मेहमान आया। अंकल जी उन्हें मंदिर घुमाने ले गये। घर आये तो मैंने देखा अंकल जी उस मेहमान को चरखाचलाना सिख रहे थसे। 

              3
एक दिन अंकलजी मुझे कहने लगे आओ, मैं तुमहें बुलेट ट्रेन पर सैर करवाता हूं। 
स्च? मेने कहा
ळां,  औरवे मुझे एक जंगल में जे गये। ऊबड़ खबाड़ जमीन। 
टंकलन जीम ुझे आप कहां ले आये?
ैन परघुमाने लाया हूं
   प्र आप तेा मुझे जंगल में औार खेतों में ले आये हो। 
‘ःयहयीय तो कमाल है। यहीं से बुलेट ट्रेन गुजरेगी।
‘पर लाईन कहां है?
बेले, लाईन की कल्पना करो। कल्पना करो कि हयां से लाईन छि?ब्छी हुई ळै। लाईन प् र बुलेट ट्रेन दौड़ी चली जा रही है। और कल्पना करों के ट्रेन पर तुम बैठ
ै होष्’, 
  टाहा! म्जा आ रहा है ना।  हमारादेश कितनी उन्नति कर रहा है। 
हां, अंकल जी, मान गये ।       
लघु कथा -टीे
-ऐ बहन क्या कर रही हो
-करना क्या है। बोर हो रही हूं।
-मैं भी बोर हो रही थी।
-फिर क्या करें?
-चलो, मंदिर चलते हैं। 


-यार, गाय को पवित्र क्यों माना जाता है?
एक जानवर को पवित्र माना जाता है। आदमी को नही।
-क्योंकि गाया का दूध पीते हैं। उका गोबर लीपा जाता । क्या आदमी का गोबर लीप सकते हैं। 














कबीर खड़ा  बाजार में....
कबीर खड़ा बाजार में सबसे मांगे वोट
एक को गले लगाय के दूजे को दे चोट।
पांच साल तक पण्डों के संग, खाई खूब खीर
पड़ी जरूरत वोट की, आया याद कबीर।
कबीर खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर
एक से रखी दोस्ती एक से रखे बैर। 
आया पास कबीर के मुझको डालो वोट।
बात अगर मानी नहीं, देंगे गहरी चोट। 




















याद है मुझको वह गुजरा जमाना
बीते दिन 
अच्छे हो या बुरे 
ुकुछ सालो  बाद
जब याद आते हों तो, वे संघर्ष के दिन
 बीते दिनों के मित्र
अच्छे हो या बुरे
 कुछ सालों बाद
तो अच्दे लगते हैं
याद करके
कभी कभी  कसैले भी लगने लगते ळैं
 उनके कहे कटु शब्दल
जब कभी वे हमारा मजाक उड़ाया करते थे

बुरे लगते वे दिन किन्हीं अवसरों पर
 जो कीाी उन्होंने हमें कहे थे 
या फिर भी वेदिन अच्दे लगते हैं
ज्ब याद आते हैं वेउिदन क्यों कहे थे हमने उनको गलत शब्द
ब्हुत बुरे लगते हैं हम अपने आप को 
ज्ब याद आते हें वे पुराने दिन
ल्ेकिन सबसे अच्दे लगते हैं वे पुराने दिन
 ज्ब याद आते हैं हमें कुछ अच्छे मित्र
 म्नही मन हम उन्हें प्यार करते 
अच्छा लगता थनके साथ बैठेना गप्पें मारना
 अवसरों की तलाश में रहते थे हम
 उनके साथबातें करना 
या अवसरों की खोज करना 
ळमारा यह खोजी मन
 च्मक उठती थीं हमारे आंखे अचानक 
डनकोअपने सामने देख
 एक इतिहास होते सबके बीते हुए कल का
 जे कीाी लिखा नहीं जाता 
प्र उकरा रहता है जीवन पर्यंत हमारे मन पर
  किन्हीं पन्नों पर 
समय के साथ  
हमस ब ऐतिहासिक पुरुष हैं
  वह इतिस लिखानही जाता कागज के पन्ने पर और 
मर जाता है समय के साथ हमारे साथ ही 
हम सब पन्ना हैं इतिहास के एक बड़े ग्रंथ का। 



























मेरा बचपन

ओ मेरे बचपन
तू कभी लौट कर मत आना
मैं नहीं याद करना चाहता अपना बचपन
पिता की मार सहना
कभी खेले न थे साथियों के संग
मैं नही चाहता मुझे याद आयें
वे दिन
विषाद से भरे।
मैं नहीं चाहता मुझे याद आये वे दिन
मेरे शराबी बाप का मारना मेरी मां को, 
निकालना गालिया मां को
मैं देखता हूं अपनी कमर पर वे निशान
अपने बापू की मार के। 
मेरा बचपन कभी लौट कर मत आना।
मैं नहीं याद करना चाहता
उस बचपन को 
लच्छू हलवाई की दुकान पर
 जूठे कप धोते हुए उन मेरे नन्हें हाथों को। 
मैं नहीं याद करना चाहता 
उन बचपन के दिनों को
नहीं याद करना चाहता स्कूल ड्रेस में जाते हुए उन बच्चों को 
जो कभी देख लेते थे मेरे हाथों में जूठे कप। 


मैं नहीं चाहता  अपनी मां को 
शराबी बापू के हाथों पिटते हुए देखना
 नही  देखना चाहता हूं अपनी मां की आंखों में वह खौफ  
गिड़गिड़ाते हुए बापू के सामनेे। 
 नहीं सुनना चाहता मैं अपने बापू को कहते हुए
‘ओ हराम की औलाद’
कितनी बड़ी गाली थी वह
मेरी मां के लिए ।
ओ मेरे बचपन !
तू कभी लौट के मत आना मेरे लिए। 
मैं नहीं देखना चाहता भूखे अपनी मां को 
जो अपने हिस्से की रोटी मुझे खिला देती थी। 
और रहती थी खसुद भूखे। 
मैं पहनना नहीं चहता
किसी के उतरे कपड़े
जो लेकर आती थी मेरी मां
मेरी मुंह बोली मौसी के घर से। 
ओ मेरे बचपन
तु लौट क ेमत आना!
मैं नहीं चाहता  झूठ बोलना मास्टर जी के सामने
बहाने बना कि भूल गया मैं फीस लाना, 
मैं नहीं चाहता कि मांग कर पढ़ना किताबें अपने दोस्तों से। 
     

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

सरदार पटेल, देखोे आपके देश में क्या हो रहा है?



           सरदार पटेल, देखोे आपके देश में क्या हो रहा है?  


                            सरदार पटेल, आपको हम सब देशवासियों का नमन!

       आपको सबसे ऊंचे मंच पर खड़े देखकर खुशी हुई। 

       आप तो पहले भी सबसे ऊँचे थे। अब प्रतिमा के रूप में भी सबसे ऊँचे हैं। आपको स्टेच्यू आॅफ यूनिटी कहा गया है। आप सचमुच एकता के प्रतीक थे। यह खिताब आप से कोई नहीं छीन सकता। आप सब भारतीयों के थे। परंतु आपके तथाकथित चेलों चपाटों ने आपको अब एक सीमा में बांध दिया है।                    

         आपको बुत के रूप में एक जगह बांध कर खड़ा कर दया है। हमने आपके बुत का उद्घाटन होते देख,ा  परंतु  वहां किसी प्रकार की एकता के दर्शन नहीं हुए। आपको एक वर्ग तक सीमित कर दिया गया।  आपको वोट के लिये छीन लेने की कोशिश हो रही है। न वहां विपक्ष था, न वहां मुस्लिम या सिख या ईसाई दिखाई दिये। आपने भारत की रियासतों को भारत रूपी माला में पिरोया था। परंतु राज्यों का कोई प्रतिनिधि वहां नहीं था। क्या यह सब देखकर आपको बुरा नहीं लगा? हमने वहां पर आपके सिद्धांतों के परखचे उड़ते देखे। 

             सरदार! अब जब आप सबसे ऊँचे मंच पर खड़े हैं, तो आपको वहां खडे़-खडे पूरा भारत नजर आ रहा होगा। आप वहां खड़े देख रहे होंगे कि आपके भारत में क्या हो रहा है। आपके उद्घाटन की जब तैयारियां हो रही थी, उस समय पश्चिमी बंगाल के 24 परगना के एक गांव  में एक बाप अपनी दो महीने की दो जुड़वां बच्चियों को कुछ रूपयों के बदले बेच रहा था। कोई बाप यूं ही नहीं अपनी बेटियों को बेचता। तभी बेचता है जब उसके पास उन्हें खिलाने के लिए पैसे नहीं होते।

              सरदार! अपने चेलों से बस इतना कह देना कि उन्होंने आपके बुत पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च कियें हैं। कुछ रुपये देश की ऐसी बच्चियों के ऊपर भी खर्च कर दें ताकि किसी गरीब बाप को अपनी बेटी न बेचनी पड़े।

हे  सरदार!  आप अमर रहें,! अमरे रहें                                                              

                                                                                    -बलदेव सिंह महरोक



शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

झुमके की तलाश

                                                                                व्यंग्य   (Excuse me Sir!)
झुमके की तलाश
इस देश में बहुत से सवाल अनुत्तिरित पड़े हैं जो वर्षों से हल होने बाकी हैं। इनमें एक सवाल है झुमके का।
बात बरेली की है।   बहुत साल पहले लगभग 1965 में  इस शहर के एक बाजार में साधना का झुमका गिर गया था । वह कई दिनों तक वहां अपना झुमका ढूंढती रही थी, गली-गली, बाजार-बाजार। बाज़ारों में गाना गाते हुए। पर झुमका नहीं मिला। मिलता भी क्यों? लोग बड़े बेईमान होते है। कौन देता है इतना कीमती झुमका। वह भी अगर साधना का हो। 

यह तो उस समय की राज्य सरकार की जिम्मेवारी थी कि वह झुमका ढूंढ कर देती। राज्य सरकार अगर कामयाब न हो तो केंद्र सरकार की जिम्मेवारी थी । अगर फिर भी न मिलता तो सीबीआई जांच बैठाती, कोई आयोग बैठाती । परंतु सरकारें अक्सर वे काम नहीं करतीं जिनसे उनको वोट न मिलता हो। उत्तर प्रदेश में उसके पश्चात कई सरकारें आई,, चैधरी चरण सिंह की, चंद्र भानु गुप्ता की, सुचेता कृपलानी की,  कमलापति त्रिपाठी की,, एच.एन. बहुगुणा की,  एन डी तिवाड़ी की,  आर.एन.यादव, बनारसी दास, श्रीपति मिश्रा,  वीर बहादुर सिंह , वी.पी. सिंह,  कल्याण सिंह, मुलायम सिंह , राजनाथ सिंह, मायावती , अखिलेश यादव और अब अदित्य नाथ योगी की । लेकिन अभी तक वह झुमका गायब है। किसी ने परवाह नहीं की। आज अगर हेमा मालिनी का झुमका गिर जाता तो उसे ढूंढने के लिए भाजपा सरकार ऐड़ी-चोटी का जोर लगा देती। भाजपा सरकार की यही एक खासियत है।

पिछली बार जब मोदी जी बरेली गये थे तो  उन्होंने झुमके का जिक्र किया था।  अब फिर चुनाव आने वाले हैं । मोदी जी अपने भाषणों में कह सकते हैं कि कांगे्रस ने 60 सालों में क्या किया। जो  एक झुमका नहीं ढूंढ सकी । इतना पुराना गुम हुआ झुमका पांच साल में तो नहीं ढंूढा  नहीं जा सकता। कम से कम दस साल चाहिए। वे सन 2022 तक जरूर ढूंढ कर देंगे।

    अब समय आ गया है कि हम उस गुम हुए झुमके की तलाश करें। बरेली के मतदाताओं के लिए यह एक अच्छा मौका है कि वोट उसी पार्टी को देंगे  जो वायदा करेगी कि झुमका ढंूढ कर देगी।  यह बरेली के लोगों की नाक का ही सवाल नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश के की जनता की इज्जत का भी सवाल है जो वर्षों से बना हुआ है।
इंतज़ार करते हैं कि क्या होता है।
          --बलदेव सिंह महरोक






बुधवार, 19 सितंबर 2018

       अंधेर नगरी
(कोतवाल की कचहरी में)
-श्रीमान, शेल्टर होम में बच्चियों से रेप होता था।
-बहुत बुरी बात है।
- हां साहब।
-कौन चलाता था शेल्टर होम को।
-साहब एक नेता है । वही चलाता था।
 -उसे पकड़ कर लाओ।
-कैसे पकड़ें श्रीमान, नेता है वह। कानून का मालिक वही है। 

3
-कहां होता था रेेप?
-इस बिल्डिंग मे।
-बिल्डिंग किसने बनाई थी।
 -साहब, ठेकेदार ने।
-ठेकेदार को पकड़ कर लाओ। 

4

-ठेकेदार! क्या यह बिल्डिंग तुमने बनाई है?
-साहब मैंनेे तो ठेका लिया था। बिल्डिंग तो मिस्त्री ने बनाई है।
-मिस्त्री को पकड़कर लाओ।

-साहब मिस्त्री हाजिर है।
-क्या यह बिल्डिंग तुमने बनाई थी।
-साहब, मैंने तो ईंट लगाई थीं, जो मुझे मजदूर ने दी थी। 
-ठीक है। मजदूर को पकड़ कर लाओ।
-साहब, मजदूर हाज़िर है। 
-क्यों रे, मिस्त्री को ईंटें तुमने पकड़ाई थी?
-जी सरकार।
-पर ईंटें मैंने नहीं बनाई थी। ईंटें तो भट्ठे  से आई थी। 
-भट्ठे वाले को बुलाओ। 
-साहब भट्ठे वाला हाजिर है। 
-तुमने कैसी ईंटें बनाई हैं?
-साहब, ईंटे तो पथेरे ने पाथी थीं,  मैंने नहीं। पूछ लो चाहे ।  मेरे साथ ही आया है। 
-क्यों रे पथेरे, ये ईंटे तुमने पाथी थीं ?
-जी सरकार।
-तुमने ऐसी ईंटें क्यों बनाई। 
-????
...........आर्डर,.. आर्डर...आर्डर..
सभी सबूतों के आधार पर इस पथेरे को सात साल बामुशक्कत कैद की सजा दी जाती है। 

सोमवार, 6 अगस्त 2018

Laghu Katha- पिकनिक

                                                    पिकनिक

सुबह का समय था।  कर्मचारी अपनी-अपनी डियूटी पर पहुंचे ही थे, और स्कूलों में अभी पहली घंटी ही बजी थी कि  रेडियो और चैनलों पर एक खबर प्रसारित होने लगी ।  देश के एक शीर्ष नेता का निधन हो गया था। सरकार ने उनके निधन पर सारे दश में सात दिन के शाोक की घोषणा कर दी थी। साथ में यह भी घोषणा की जा रही थी कि नेता जी को श्रद्वांजति स्वरूप आज का दिन सभी स्कूलों और सरकारी कायालयों में अवकाश कर दिया गया है।
छुट्टी की खबर सुन कर स्कूलों में विद्यार्थियों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा  वे अपने-अपने बस्ते उठा कर शोर मचाते हुए घरों की ओर भागन लगे कि चलो, आज का दिन मुफ्त में एक छुट्टी मिली।
इधर नीरज बाबू अभी कार्यालय में पहुंचे ही थे कि  यह खबर उनके कानों में पड़ी।  सुनते ही तुरन्त उन्होंने घर पर पत्नी को फोन किया-‘सुनो! दफतर में छुट्टी हो गई हैं। वह क्या है कि कोई नेता  प्लेन दुर्घटना में मर गया है। मैं जल्दी घर पहुंच रहा हूॅ। मौसम अच्छा है।  तुम बच्चों के साथ तैयार हो जाओ। आज हम पिकनिक मनाने चलेंगे। ’
और नीरज बाबू  ओठों को गोल गोल बनाकर सीटी बजाते हुए वापस  घर  जाने की तैयारी करने लगे।

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

नास्तिकों की संख्या हिंदू धर्म से ज्यादा

विश्व में नास्तिकों की संख्या हिंदू धर्म को मानने वालों की संख्या से ज्यादा

यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए विश्व में नास्तिकों की संख्या विश्व में हिन्दुओं की कुल जनसंख्या से ज्यादा है। कुछ दिनों पहलेे ‘नवभारत’ में छपी एक रिपोर्ट जो कि ‘एडिहेरेंटस डाॅट काॅम’ ओर पी यू रिसर्च से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित है, द्वारा विश्व में विभिन्न धर्मों को मानने वाली की संख्या इस प्रकार हैः-

विश्व की वर्तमान कुल जनसंख्या: लगभग सात अरब
1. ईसाई   -   220 करोड़  ;31.5 प्रतिशत
2. इस्लाम -   160 करोड़  ; 21 प्रतिशत
3. नास्तिक -  110 करोड़ ;15.35 प्रतिशत
3. हिन्दू   -  100 करोड़   ;13.95 प्रतिशत
4. चीनी पारंपरिक धर्म   -  39.4 करोड़
5. बौद्ध धर्म -        37.6 करोड
6. जातीय धार्मिक समूह  -  40 करोड़
7. सिख धर्म  -     2.3 करोड़
8. जैन धर्म -       42 लाख
9. शिंटो धर्म ; जापान - 40 लाख

परंतु 2011 में की गई  जनगणना के मुताबिक भारत में केवल 33004 ही नास्तिक ही दर्शाये गये हैं।  अर्थात 120 करोड़ जनता का केवल 0.0027 प्रतिशत।  ज्ञात रहे कि 2011 की जनगणना में पहली बार नास्तिकों की भी गणना की गई थी।

नास्तिकों को इन आंकड़ों को जानकर बहुत आश्चर्य हुआ है। निश्चय ही यह एक शरारतपूर्ण डाटा है।
‘भारत में लाखों की संख्या में ऐसे लोग  हैं जो किसी भी जाति अथवा धर्म में विश्वास नहीं रखते। वे प्रायः अपने आप को नास्तिक, तर्कवादी  मानते हैं या फिर किसी धर्म को न मानने वाले मानते हैं। यह कहना हैं’,  जी.विजयम का जो विजयवाड़ा में नास्तिक केंद्र के एक्सीक्यूटिव डायरेक्टर हैं।
‘जब आप यह कहते हैं कि नास्तिक केवल थोड़े से ही हैं तो आप वास्तविकता को तोड़-मरोड़ रहे हैं। यह रूढ़िवादियों और जनगणना अधिकारियों की शरारत है और इसे दुरुस्त करने की जरूरत है।’  विजयम ‘साईस एण्ड रैशनेलिस्ट  एसोसिएशन आॅफ इंडिया’  के प्रबीर घोष बताते हैं।
उन्होंने बताया कि जब जनगणना करने वाला कर्मचारीे उसके घर आया  तो घोष ने पूछा कि ‘आपने अपने रजिस्टर के धर्म के काॅलम में क्या लिखा है?’ तो कर्मचारी ने जवाब दिया ‘क्यो.ं?..हिन्दू..आप हिन्दू के हैं।  आप  हिन्दु नहीं हैं क्या? आपका उपनाम हिन्दू है।’ ‘इस पर मैंने  प्रोटेस्ट किया और बताया कि  मेरे नाम के सामने ‘नास्तिक’ लिखो। तो वह बीच में ही बोला कि इसके लिये तो उसे बहुत काट-पीट करनी पड़ेगी।’ यह सुनकर मैंने उससे वह कागज छीन लिया और उसमें लिखा ‘हिन्दू’ शब्द काट दिया’'', घोष बताते हैं।
श्री घोष एक कट्टड़ धार्मिक  बंगाली के रूप में पैदा हुए थे परन्तु व्यस्क होते ही उन्होंने एक रैशनेलिस्ट का रास्ता अपना लिया था। वे कहते हैं कि भारत में जनगणना वैज्ञानिक रूप से और ईमानदारी से नहीं की जाती।
जनगणना कितनी गलत है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है तामिलनाडू जैसे दृढ़ रैशनेलिस्ट  परम्परा वाले राज्य में में केवल 1297 नास्तिक दर्शाये गयेे हैं। द्राविड़ लिययक्का तामिझार परवई के सूबा वीरापांड्आन के अनुसार यह आंकड़ा बिल्कुल गलत है। वे कहते हैं कि  ‘केवल हमारे संगठन  के ही लगभग 2000 सदस्य हैं। जबकि हमारा संगठन तामिनाडु  सभी रैशनेलिस्ट आंदोलनों की जननी है।
विजयम ने अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि यह सब  हमारे देश में लोगों को जानकारी न होने के कारण बहुत सारे नागरिकों को यह ज्ञात ही नहीं है  ‘कोई जाति नहीं’ अथवा ‘कोई धर्म नहीं’  लिखवाने जैसा उनके पास विकल्प भी होता है। श्री विजयम के पिता ने एथीस्ट सैंटर  नामक एक नास्तिक केंद्र की स्थापना की थी । इस संगठन ने उन लोगों के लिए  जनगणना विषय परबहुत संघर्ष किया है  जो सरकारी फार्मों के जाति अथवा धर्म के कालम  में ‘कोई नहीं’ अथवा  ‘निल’ लिखवाते हैं परन्तु कर्मचारियों द्वारा अड़चनें डाली जाती हैं।
विजयम कहते हैं कि  लगभग 29 लाख लोग ऐसे हैं जो गणना कर्मचाारियों को अपना धर्म नहीं बताते क्योंकि वे किसी भी धर्म को नहीं मानते परन्तु अपने आप को नास्तिक भी नहीं कहते हैं। यह संख्या और भी ज्यादा हो सकती है।  
‘नास्तिक’ शब्द सुनने में अपने आप में एक बड़ा अजीब सा शब्द प्रतीत होता है। शायद इसीलिए  कुछ लोग किसी भी धर्म को न मानते हुए अपने आप को नास्तिक नहीं कहते क्योंकि जब हम अपने आप को एथीस्ट कहते हैं तो उन्हें समाज में या तो अविश्वास के  साथ देखा जाता या फिर बड़ी अजीब नज़रों से देखा जाता है। वास्तव में नास्तिकों को संख्या  हमारी सोच  से कहीं ज्यादा है। ऐसे अधिकतर लोग नास्तिक होते हुए भी समाज के रीति रिवाजों के दबावों का सामना नहीं कर पाते और मजबूरन उन्हें उनका साथ देना पड़ता है अथवा उनमें शामिल होना पड़ता है।

 - बलदेव सिंह महरोक

¹¹‘‘एडिहेरेंट्स डाॅट काॅम’ विश्व में धार्मिक व अन्य प्रकार के आंकड़े एकत्रित करने वाला एक प्रमुख साईट है। 

 कितना अच्छा लगता है कितना अच्छा लगता है राजा को जब रियाया खड़ी होती है हाथ पसारे   उसके महल के द्वार पर कितना अच्छा लगता है राजा को जब रियाय...